रविवार, 27 जुलाई 2014

10 : ये कल की बात है

                                                           ये कल की बात है :
                                                         ============

          सन १९९५ में छोटा भाई राजकुमार भी घर से बेदखल हो गया, इस प्रकार दद्दाजी के तीन मंजिला विशालकाय ‘घर’ में केवल दो प्राणी बच गए; एक उनकी पत्नी याने अम्माजी और दूसरे वे स्वयं. अस्सी 'प्लस’ के दो वृद्ध, नौ जीवित बच्चों के जनक, बिना किसी देखरेख के अपने घरौंदे में सिमट कर अपने जीवन की अंतिम सांसों को लेने और छोड़ने के लिए बच गए. समस्या यह थी कि अब कौन खाना बनाए ? माधुरी ने निर्णय लिया कि उनका दोनों समय का भोजन वे अपनी रसोई में तैयार करके प्रतिदिन भेजेंगी. 
          उन्हीं दिनों मुझे कोरबा जेसीज़ में प्रशिक्षण देने का निमन्त्रण मिला. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री आर॰के॰जायसवाल थे जो एन.टी.पी.सी. जमनीपाली (कोरबा) में मानव संसाधन और 'सिमुलेटर' विभाग के उपमहाप्रबन्धक थे. दो घंटे तक चले उस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विषय था ‘मना करने की कला’ जिसे उन्होंने पूरे समय बड़े ध्यान से देखा-सुना और मुझसे पूछा- ‘हमारे यहां प्रशिक्षण देंगे?’
‘अवश्य.’ मैंने कहा.
‘किन-किन विषयों में करते हैं?’
‘व्यवहार विज्ञान, प्रबन्धन और व्यक्तित्व विकास पर.’
‘हूँ!’
‘जी.’
‘क्या लेंगे?’
‘एक दिन के कार्यक्रम का दो हजार, ’
‘आपको छः दिन तक लगातार प्रशिक्षण देना होगा, प्रतिदिन सात घंटे.’
‘ठीक है, मंजूर.’
‘एक 'प्रपोजल' मुझे भेज दीजिए, मैं आपको ‘शिड्यूल’ भेजता हूं.’
‘जी.’ मैंने अपनी प्रसन्नता छुपाते हुए गंभीर मुद्रा में कहा. यह छोटा सा वार्तालाप कालान्तर में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ. मुझे उस संस्थान में तेरह वर्षों तक प्रशिक्षण देने का अवसर मिलता रहा. प्रशिक्षण शुल्क दो हजार से अढ़ाई हुआ फ़िर तीन और फ़िर पांच हजार. 'लिखा न पढ़ी- जो मैं कहूं वह सही'- मैंने वहां लगभग दो सौ दिनों तक कार्यक्रम किए होंगे, कोई पचास-साठ विषयों पर प्रशिक्षण दिया और मज़े की बात- मैं वहीं एक नए विषय में पारंगत प्रशिक्षक बन गया- स्वास्थ्य प्रबन्धन!
          वैसे तो, हर प्रशिक्षण कार्यक्रम में कोई-न-कोई ऐसी घटना ज़रूर होती है जिसे बताया जा सकता है॰ उन्हें बताना शुरू करूंगा तो यह कथा प्रशिक्षणकथा बन जाएगी इसलिए एक-दो ऐसी घटनाएं बताऊंगा जिन्होंने मुझे संकट में डाला. अभी, एन.टी.पी.सी. के एक कार्यक्रम का विवरण पढ़िए: स्वास्थ्य प्रबन्धन के विषय पर चर्चा करते समय 'आहार संतुलन' के बारे में समूह को बताया जा रहा था. एक सज्जन ‘ओव्हर-वेट’ दिख रहे थे. मैंने उनसे पूछा- ‘क्या आप मानते हैं कि आपके शरीर का वजन ज़रूरत से अधिक है ?’
‘जी सर.’ उन्होंने उत्तर दिया.
‘उसे कम करने के लिए कुछ किया ?’
‘बहुत कोशिश की पर कम नहीं हुआ.’
‘अच्छा क्या-क्या किया आपने ?’
‘रोज घूमने जाता हूं, तला-भुंजा नहीं खाता, मैंने मांस-मटन तक खाना छोड़ दिया सर, पर मेरा वजन कम नहीं होता.’
‘मेरे पास एक ‘आइडिया’ है.’
‘सर, बताइये सर.’
‘शक्कर और मीठा खाना छोड़ दीजिए, वजन धीरे-धीरे कम हो जाएगा.’
‘सच में !’
‘हां, सच में.’
‘पर सर, शक्कर छोड़ना आसान है क्या ?’ उसने पूछा. मैं जवाब न दे सका और चुप रह गया.
         मिठाई की दूकान में मैंने लगभग तीस वर्षों तक काम किया. वहां मुझे प्रतिदिन स्वाद की जांच करने के लिए बदल-बदल कर मीठा खाना पड़ता था इसलिए चखने के चक्कर में मैं मीठाखोर हो गया. जब मिठाई दूकान हाथ से निकल गई तब भी मीठा खाने की ललक बनी रहती थी. मैं बाज़ार से मीठा खरीदकर ले जाता था और दोनों समय भोजन के बाद उसका प्रेमपूर्वक सेवन करता था. दूसरी दूकान से मिठाई खरीदता देख कई लोग मुझसे पूछते थे- ‘अरे, आप यहां से ले रहे हैं, 'पेन्ड्रावाला’ का मालिक दूसरी दूकान से मीठा खरीद रहा है?’ अब, मैं उन्हें क्या बताऊं कि मैं वहां का मालिक नहीं रहा इसलिए वहां से मीठा प्राप्त करने का अधिकार छिन गया. ठीक है कि छोटा भाई है लेकिन रोज-रोज मांगना याने किसी दिन अपनी बे-इज़्ज़ती करवाना था इसलिए 'बच के रहो रे बाबा, बच के रहो रे !'
          उस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुझसे पूछा गया सवाल- ‘शक्कर छोड़ना आसान है क्या ?’- मेरे पीछे लग गया. उस शाम जब कार्यक्रम खत्म करके मैं 'गेस्टहाउस’ पहुंचा, कई घंटों तक बेचैन रहा और इस अपराधबोध से ग्रस्त रहा कि जो मुझसे नहीं सधता, वैसी सलाह दूसरे को क्यों दी ? शक्कर छोड़ने वाला 'आइडिया' मुझे मोहनदास करमचंद गांधी की पुस्तक ‘Key To Health' से मिला था, मैंने उसे आगे बढ़ा दिया, अब मैं फँस गया था. 
          उसके बाद कई दिनों तक मेरी यह बेचैनी कायम रही. एक दिन मन ही मन मैंने गांधीजी से बात की- 'अच्छा फँसाए बापू, मुझे चैन नहीं, अब क्या करूँ ?' मुझे जैसे गांधीजी की आवाज़ सुनाई पड़ी- 'बच्चू, जब तुम खुद शक्कर खाना बंद करोगे तब ही तुमको चैन आएगा; वैसे भी, तुम्हारा वजन बढ़ा हुआ है, कुछ कम कर लो.' मुझे उपाय मिल गया, मैंने शक्कर छोड़ दी, एकदम बंद. यहाँ तक कि भगवान को चढ़ाया प्रसाद तक नहीं खाया लेकिन मेरी छोटी बेटी संज्ञा के विवाह कार्यक्रम संपन्न होने के बाद जब हम लोग विवाह-भवन से बिलासपुर वापस जाने के लिए निकल रहे थे, तब मेरे समधीजी ने मुझसे कहा- 'मुझे मालूम है कि आप मीठा नहीं खाते लेकिन यह शगुन का मीठा है, इसे ले लीजिए.' मैं धर्मसंकट में पड़ गया, उनका मान रखना ज़रूरी था, उनकी बात कैसे काटूँ ? मैं मान गया, उन्होंने काजू की बर्फी का आधा टुकडा मेरे मुंह में रख दिया. हम सब ने उनसे विदा ली, कार में बैठे और उनसे ओझल होते ही उस मिठाई को मैंने मुंह से बाहर निकाल कर एक छोटे से कागज़ में लपेटकर जेब में रख लिया और पानी से कुल्ला कर लिया ताकि मीठापन मेरे हलक नीचे के उतर न कर सके.
          मेरा यह व्रत तीन वर्षों तक चला, उसके बाद मैं फिर मीठा खाने लगा. आप पूछेंगे- 'अरे ! क्या हुआ ?' यह बताने का समय अभी नहीं आया है, समय आने दीजिए, ज़रूर बताउंगा.

            प्रशिक्षण का काम बढ़ाने में बिलासपुर शहर का नाम मददगार और असरदार नहीं था. उन दिनों, कार्पोरेट सेक्टर में प्रशिक्षण करवाने का चलन बढ़ रहा था लेकिन उन्हें मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलौर और पुणे जैसे महानगरों के प्रशिक्षक अधिक आकर्षित किया करते थे. एक तो मैं 'मार्केटिंग' में आलसी था और संकोची भी, ऊपर से जब 'बिलासपुर जैसे अन्जान शहर के प्रशिक्षक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल' ने कई संयंत्रों को कार्यक्रम के लिए पत्र भेजा तब किसी ने उस पत्र का उत्तर देने का कष्ट भी नहीं किया, लेकिन अपवादस्वरूप हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड नासिक ने उत्तर भी दिया और दो बार बुलवाया भी.
           मुझे अधिक काम न मिलने की एक और वज़ह थी, मेरी प्रशिक्षण-भाषा. मैं हिन्दी में प्रशिक्षण देता था और उन्हें अपने 'एक्ज़ीक्यूटिव' के लिए अंग्रेजी बोलने वाला प्रशिक्षक चाहिए था. अंग्रेजी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी क्योंकि सारी पठनीय सामग्री अंग्रेजी में ही उपलब्ध थी. मैं अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षण दे सकता था लेकिन उस पर मेरी पकड़ मजबूत नहीं थी. प्रशिक्षणार्थियों पर जो प्रभाव  मैं हिन्दी में पैदा कर सकता था, वैसा अंग्रेजी में नहीं कर पाता. कामचलाऊ, टरकाऊ या पैसा-बनाऊ काम करना मेरे स्वभाव में नहीं रहा इसलिए जितना भी काम मिला, मैं अपनी मातृभाषा से ही जुड़ा रहा. प्रशिक्षण देने का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना ही नहीं होता, विषय का प्रभाव स्थापित करना होता है. प्रशिक्षण केवल 'कहना-सुनना' नहीं है, वरन, बड़े जतन से प्रशिक्षु के 'माइंड-सेट' को अपेक्षित दिशा में मोड़ना होता है. 
        बिलासपुर के आशुतोष मिश्र उन दिनों 'लार्सन एन्ड ट्युब्रो सीमेंट्स' (अब अल्ट्रा-टेक सीमेंट) में मानव संसाधन विभाग में प्रशिक्षण के संयोजन अधिकारी थे. उन्होंने मुझे चंद्रपुर (महाराष्ट्र), हिरमी (अब छत्तीसगढ़) और झारसुगुडा (ओडिसा) के संयंत्रों में प्रशिक्षण देने के अनेक अवसर दिए. हिरमी संयंत्र में प्रशिक्षण के दौरान एक प्रतिभागी ने मुझसे बेहद कठिन प्रश्न पूछा- 'सर, क्या आप भगवान को मानते हैं ?'
'इसका उत्तर मैं क्या दूँ ?' मैंने उन्हीं से पूछ लिया.
'मानते हो तो हाँ बोलिए, न मानते हो ना बोलिए.' मैं चुप रहा। मैं कोई जवाब न दे सका तो उन्होंने एक नया प्रश्न मुझ पर फेंका- 'अच्छा यह बताइये, आप अपने घर में भगवान की पूजा करते हैं या नहीं?'  
'हाँ, करता हूँ.' मैंने कहा.
'इसका मतलब साफ़ है कि आप भगवान को मानते हैं.'
'न, न, पूजा करना और भगवान को मानना अलग-अलग बात है.'
'क्या मतलब ?'
'मेरे पूजा करने की वज़ह कुछ और है.'
'क्या है सर ?'
'हुआ यह, जब मेरे माता-पिता बिलासपुर वाला अपना घर छोड़कर रायपुर अपने बड़े बेटे के घर 'शिफ्ट' हो रहे थे तब उनके घर में स्थापित भगवान की मूर्तियाँ उन्होंने हमें दे दी ताकि उनकी नियमित पूजा होती रहे. उन मूर्तियों को हमारे घर में स्थापित कर दिया गया और मेरी पत्नी माधुरी उनकी पूजा किया करती थी. एक दिन माधुरी ने मुझसे कहा- "घर में भगवान विराजे हैं, तुम अगर सिर झुकाकर प्रणाम कर लोगे तो क्या तुम्हारी इज्ज़त चली जाएगी ?"
"ऐसा नहीं है, पर तुम जानती हो मेरा पूजा-पाठ पर से विश्वास उठ चुका है, यह सब अब मुझसे नहीं होता."
"ठीक है, लेकिन यह तो सोचो, हमारे घर में भगवान प्रतिदिन पूजे जाने के लिए भेजे गए हैं लेकिन हर माह के चार दिन बिना पूजे रह जाते हैं ! क्या यह ठीक है ?" माधुरी ने मुझसे पूछा. मैं सोच-विचार में पड़ गया. उनकी बात में दम था. अगले दिन से प्रतिदिन मैं स्नान के बाद ज्ञात-विधि-विधान से भगवान की दिल लगाकर पूजा करने लगा. अन्त में शंख बजाता ताकि माधुरी घर में जहां कहीं हों, उन्हें मालूम पड़ जाए कि मैंने पूजा की !'
'आपने सही किया, सर.' प्रतिभागी ने कहा. 'आखिर आपको आपकी पत्नी ने भगवान से जोड़ दिया, वे कितनी समझदार हैं.'
'आप सही कह रहे हैं लेकिन वह पूजा मैं भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं, अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए करता हूँ.' मैंने उनको बताया.
          यह घटना १९९६-९७ की रही होगी, अब मैं आपको सन २०१० की एक घटना बताता हूँ, इन दोनों घटनाओं को जोड़ेंगे तो बात अधिक पकड़ में आएगी. बिलासपुर के ज्येष्ठ नागरिक संघ के एक कार्यक्रम में मुझे वरिष्ठजनों के (शेष) जीवन को सार्थक दिशा देने हेतु व्याख्यान के लिए बुलाया गया था. उन्हें मैंने कुछ 'टिप्स' दिए लेकिन आप तो जानते हैं कि सूखे पौधे पर पानी देने से कोई खास लाभ नहीं होता बल्कि पानी व्यर्थ चला जाता है किन्तु कुछ अपवाद भी होते हैं.  
          अगले दिन एक सज्जन जिनकी उम्र अस्सी से अधिक रही होगी, लड़खड़ाकर चलते हुए मेरी होटल में मुझसे मिलने पधारे. कार्यक्रम की बातों से प्रभावित होकर वे अपनी पारिवारिक समस्या पर मुझसे सलाह लेने आए थे. वार्तालाप इस तरह था, पढिए :
'मुझे जानते हो, आपके पिताजी जब राईस मिल चलाते थे तब मेरे पास आफिस आया करते थे.' उन्होंने मुस्कुराते हुए बात शुरू की. 
'जी, मैं आपको पहचानता हूँ.' मैंने विनयपूर्वक कहा.
'कल आपने बहुत अच्छा बोला इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मैं अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर आपकी राय लूँ.'
'आप मुझसे इतने सीनियर हैं, मैं आपको भला क्या राय दे सकता हूँ !'
'ऐसा मत कहिये.'
'चलिए, बताइए.'
'मेरी पत्नी को स्वर्गवासी हुए बहुत समय बीत गया, मेरे साथ बेटा-बहू रहते हैं. बेटा वकालत करता है और बहू तीस किलोमीटर दूर एक सरकारी स्कूल में 'टीचर' है.'
'जी.'
'बहू रोज सुबह साढ़े नौ बजे हमारे लिए खाना बनाकर नौकरी पर निकल जाती है, बेटा ग्यारह बजे कचहरी चला जाता है. दोपहर एक बजे जब मुझे भूख लगती है तो मैं अपने हाथ से खाना परोसकर खाता हूँ पर ठंडा हो जाने के कारण मुझसे खाया नहीं जाता.'
'तो, गरम कर लिया करें.'
'दाल-सब्जी हो जाती है पर रोटी और चावल दोबारा गरम करने में भाता नहीं.' 
'जी, आप ठीक कह रहे हैं,'
'मैं बहू को समझाता हूँ कि नौकरी छोड़ दे, मेरी पेंशन और बेटे की वकालत से घर चल जाता है परन्तु वह मानती नहीं. बेटा भी अपनी घरवाली की तरफदारी करता है. मैं बहुत दुखी हूँ. असल में मैं शुरू से ही गुस्सैल रहा हूँ, कोई कहना नहीं मानता तो मुझे आग सी लग जाती है.'
'मेरी राय है कि सबसे पहले आप यह बात समझें कि आपकी पत्नी की तरह कोई दूसरा आपकी देखभाल और सेवा नहीं कर सकता.'
'सही है.'
'अब मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ,  घर में आप देवी-देवताओं की पूजा करते हैं या नहीं ?'
'हाँ, प्रतिदिन करता हूँ.'
'लक्ष्मीजी और दुर्गाजी की ?
'हाँ,'
'तो उनके चित्रों के समीप अपनी बहू का भी चित्र रख लीजिए॰'
'क्यों ?'
'क्योंकि वे आपके घर में विराजमान साक्षात देवी अन्नपूर्णा हैं. सुबह-सुबह नौकरी पर निकलने के पहले आपके लिए भोजन तैयार करके जाती हैं, सोचिए, वे आपकी कितनी फ़िक्र करती हैं !'
'अरे, इस बात में मेरा कभी ध्यान नहीं गया लेकिन अब मेरी समझ में आ रहा है; लेकिन मैं क्या करूँ, मुझे गुस्सा बहुत आता है.'
'अब गुस्सा करोगे तो किस पर, अंकल जी ? आपका गुस्सा सहने वाली आपकी पत्नी तो आपको छोड़ कर जा चुकी !' मैंने कहा. 
          सहसा उनके चेहरे की रंगत बदलने लगी, वे उठ खड़े हुए. मैंने उनको प्रणाम किया, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. जब वे मेरी होटल से बाहर निकल रहे थे तो उनकी चाल में अज़ब सी मजबूती झलक रही थी। 

          मुझे जब हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स, नाशिक के वरिष्ठ प्रबन्धकों को नेतृत्व कला विकास और संप्रेषण पर प्रशिक्षण देने का निमन्त्रण मिला तो मन प्रसन्न हो गया. प्रथम- इतने महत्वपूर्ण संस्थान में प्रशिक्षण देने का अवसर और द्वितीय- आयुध विमान का निर्माण करने वाले संयंत्र को देखने का सुअवसर. नाशिक से ग्यारह किलोमीटर दूर ओझर में स्थित सुरम्य वादियों के मध्य बसा यह संयंत्र सच में मनमोहक है. प्रथम प्रवास में मेरे सहयोगी प्रशिक्षक डा. भरत शाह (इंदौर) थे और उसके अगले वर्ष के प्रशिक्षण कार्यक्रम में विवेक जोगलेकर (बिलासपुर) मेरे साथ थे. इन दोनों प्रशिक्षकों की प्रशिक्षण शैली का मैं दीवाना रहा हूं. ये दोनों जब प्रशिक्षण देने के लिए खड़े होते हैं तो मुझ पर सम्मोहन सा छा जाता है क्योंकि इन दोनों की विषयवस्तु पर पकड़ और प्रस्तुतीकरण की शैली नायाब है. मैंने अपने जीवन में ऐसे अनेक अद्भुत प्रशिक्षकों को देखा-सुना है जिनके ज्ञान और असरदार शब्दों के प्रयोग के समक्ष मैं सदैव नतमस्तक रहा और उन सबको मैंने मन-ही-मन अपना ‘गुरु’ मान लिया. वे गुरुजन जानते भी नहीं कि कोई शिष्य अदृश्य भाव से उनमें प्रविष्ट हो चुका है. मुझे प्रशिक्षण देते अब पैंतीस वर्ष हो चुके हैं, इस अवधि में उत्तर और मध्यभारत के अनेक राज्यों में हज़ारों प्रशिक्षुओं को शताधिक विषयों पर प्रशिक्षण दे चुका हूं लेकिन अब भी इन प्रशिक्षकों की दक्षता के समक्ष मैं स्वयं को बौना मानता हूं. उनको मेरा प्रणाम.
          हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स का ज़िक्र इसलिए निकला क्योंकि वहां प्रथम दिवस का कार्यक्रम समाप्त होने के पूर्व एक निमन्त्रण पत्र हमें मिला जिसमें संयंत्र के महाप्रबन्धक ने ‘डिनर’ पर सम्मिलित होने का हमसे अनुरोध किया. समय रात्रि ९ बजे, ड्रेस- ‘इन्फ़ार्मल’, स्थान- ‘एच.ए.एल. गेस्टहाउस’. नियत समय पर हम दोनों वहां पहुंच गए. महाप्रबन्धक और सह-महाप्रबन्धक ने हमारा स्वागत किया और हमें ‘गेस्टहाउस’ के बरामदे पर बिछी बेंत से बनी आरामदेह कुर्सियों पर बैठाया. हमारा अनुमान था कि कोई वृहद आयोजन होगा लेकिन ‘डिनर’ में हम चार लोग ही रहे तब समझ में आया कि वह हम लोगों के सम्मान में आयोजित था.
          बाहर की बैठक में ‘सर्विस’ आरम्भ हुई. कांच के खूबसूरत गिलास, दमकती-चमकती शराब की बोतल, साथ में एक के बाद एक परोसा जा रहा ‘चबैना’!  चबैना समझ गए न आप ? शराब की 'सिप' के साथ खाने वाला सहयोगी खाद्य जैसे छिली हुई मूंगफ़ली, मसालेदार मूंगफली, सादा चना, भुना हुआ नमकीन चना, बिस्किट आदि बारह-तेरह किस्म का सामान जिसे थोड़ी-थोड़ी देर के अन्तराल में हमें परोसा गया ! हम दोनों को शराब से परहेज था इसलिए ‘कोक’ से उनका साथ देते रहे और चबैना का लुत्फ़ भी उठाते रहे. लगभग एक घंटे बाद वहां से उठकर ‘डायनिंग टेबल’ तक गए, साथ बैठे, इस बीच ‘डिनर सर्व’ हो गया. हम दोनों को ‘मिले-जुले’ भोजन का पूर्वानुमान था लेकिन संकोचवश पूछताछ नहीं की. मुझे पालक की साग बहुत पसन्द है इसलिए अन्य वस्तुओं के मुकाबले उसे अधिक मात्रा में ले लिया. 
          भोजन भरपूर था, स्वादिष्ट था. अचानक पालक का पनीर मेरे दांतों से टकराया, मैंने सोचा कि पनीर इतना कड़ा तो नहीं होता लेकिन उसे मैं उगल कर देख भी नहीं सकता था क्योंकि वह ‘मेनर्स’ के अनुकूल न होता इसलिए उसे किसी प्रकार चबाकर खा गया और डा. भरत शाह से मैंने फ़ुसफ़ुसाकर पूछा- ‘भरत भाई, पालक का पनीर बहुत कड़क है, आपने खाया क्या?’
‘अरे, आपने पालक खा लिया क्या ? वह ‘नान-वेज’ है, उसमें पनीर नहीं, मटन है.’ वे धीरे से बोले.
‘मर गए.’
‘क्या हुआ?’
‘मैं तो उसे चबा कर निगल गया.’ मैंने अपनी भूल उन्हें बताई. 'मटन' का नाम सुनकर मुझे उबकाई सी आने लगी. ऐसा लगा कि टेबल पर ही उल्टी हो जाएगी लेकिन मैं पानी लगातार तब तक पीता रहा जब तक उबकाई शान्त नहीं हो गई. पेट पानी से ही भर गया और अच्छे-खासे ‘डिनर’ का सत्यानाश हो गया. अचानक महाप्रबन्धक का ध्यान मुझ पर गया, उन्होंने पूछा- ‘आप कुछ खा नहीं रहे हैं अग्रवाल साहब ?’
‘आपने बाहर ही इतना खिला दिया था कि अब जगह नहीं बची॰’ मैंने अपने चेहरे में छद्म संतुष्टि भाव लाकर कहा.
          दूसरे दिन का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद हमें उच्चाधिकारियों से मिली विशेष अनुमति से संयंत्र दिखाया गया. चूंकि वहां ‘फ़ाइटर प्लेन’ बनते थे, इसलिए सब कुछ वृहद आकार का था. उस संयंत्र को देखना और समझना वाकई बहुत रोचक था. हवाईपट्टी संयंत्र के अन्दर ही थी इसलिए परीक्षण-उड़ान की वज़ह से हर समय शोर होते रहता था. एक बात और, इन विमानों के निर्माण की प्रक्रिया अत्यन्त धीमी होती है, साल भर में उंगलियों में गिनने लायक ही बन पाते हैं, विमान निर्माण अत्यंत धैर्य और तकनीकी तालमेल वाला काम है. गोपनीयता की वज़ह से आपको अधिक नहीं बता सकता लेकिन हाँ, उनका निर्माण अपने देश में होता देख गर्व की जो अनुभूति हुई वह अवर्णनीय है.

          ‘नान-वेज’ की बात चली तो एक और घटना याद हो आई- हमारे पुत्र  कुन्तल उन दिनों बारहवीं कक्षा के छात्र थे, एक रात को लगभग नौ बजे मैं अपनी दूकान से वापस लौटकर आया, मुंह-हाथ धोकर भोजन की टेबल पर बैठा, मेरे साथ कुन्तल भी बैठे थे, मुझसे बोले- ‘पापा, मेरा दोस्त कह रहा था कि ‘चिकन’ बहुत स्वादिष्ट होता है, मेरा खाने का बहुत दिल है.’
‘ठीक है, खा लो.’ मैंने कहा.
‘खा लूँ ?’
‘हां, हां, दिल कर रहा है तो ज़रूर ‘टेस्ट’ करना चाहिए.’
‘पैसे दीजिए न.’ उन्होंने कहा. मैंने ‘पर्स’ से एक सौ रुपए का नोट निकालकर दिया और पूछा- ‘अपने 'उस' दोस्त को भी साथ लेते जाना, तुम दोनों खाना और देखो, जिस दूकान में सबसे अच्छा बनता हो, वहीं जाना.’
          आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि एक सौ रुपए में दो लोगों का ‘नान-वेज डिनर’ कैसे होगा ! आज से बीस वर्ष पूर्व एक सौ रुपए की शक्ति आज के मुकाबले बहुत अच्छी थी. फ़िलहाल, कुन्तल बड़ी तेजी से खड़े हुए और मुदित-भाव से चल पड़े. इधर घर में बवन्डर उठ खड़ा हुआ, सब मुझसे नाराज- ‘उसने कहा कि ‘चिकन’ खाऊंगा तो मना करने की जगह जेब से रुपए निकालकर दे दिए- ‘जाओ बेटा खा आओ.’ दोनों लड़कियों ने समवेत स्वर में मुझसे पूछा- ‘आप कैसे पापा हो ?’
‘मैं मना कर सकता था लेकिन जब उसका ‘चिकन’ खाने का दिल हो रहा है तो वह खाएगा अवश्य. मैं मना करता तो वह बाद में मेरी गैर-जानकारी में खाता. यह अच्छा है कि उसने अपने दिल की बात मुझसे ‘शेयर’ की. उसे जाने दो, खा लेने दो. मैंने सबको समझाया.’ सबने मुझे घूरकर देखा, सबके चेहरों पर किस्म-किस्म के नाराज़गी वाले भाव उभरने लगे.
          रात को करीब ग्यारह बजे श्रीमानजी घर लौटे और चटखारे लेकर ‘चिकन’ के स्वाद के बारे में सबको बताया. दोनों बहनें चिढ़ गई और बोली- ‘हट यहां से, तेरे मुंह से बदबू आ रही है, जाकर ‘ब्रश-पेस्ट’ करके आ, घिनहा कहीं का.’ खैर, कुछ देर बाद सब अपने बिस्तरों पर सोने चले गए. 
          रात को कोई दो बजे का समय रहा होगा. मेरे कमरे के दरवाजे पर खटखटाहट हुई, मैंने दरवाजा खोलकर देखा, कुन्तल मेरे सामने थे. मैंने पूछा- ‘क्या हुआ बेटा?’
‘बहुत खराब लग रहा है, पापा. अजीब बेचैनी हो रही है. मुझे नींद भी नहीं आ रही है.’ कुन्तल ने बताया.
‘क्यों ?’ मैंने पूछा॰ 
‘ऐसा लगता है कि मुझे 'चिकन’ नहीं खाना था॰ आज खाया तो उसमें कोई खास स्वाद भी नहीं था, मुझे समझ नहीं आता कि लोग क्यों खाते हैं ?’
‘अब मैं क्या बताऊं, मैंने तो कभी खाया नहीं लेकिन दुनियां की अधिकांश आबादी इसे खाती है तो ज़रूर कुछ-न-कुछ बात होगी. स्वाद खाते-खाते बनता है.’
‘आप यह बताइए कि अभी मैं क्या करूं?’
‘मुंह में उंगली डालकर उल्टी करो, पेट खाली हो जाएगा तो अच्छा लगेगा.’ मैंने सुझाव दिया. ‘बेसिन’ में जाकर उन्होंने उल्टी की, पानी पिया और तनिक शांत होकर बोले- ‘कान पकड़ता हूं, अब कभी नहीं खाऊंगा.’ फ़िर वे आराम से सो गए॰ 

          आपको पहले ही बता चुका हूँ कि कुन्तल का पढ़ाई-लिखाई में दिल नहीं लगता था॰ स्कूल जाकर वे देवी-सरस्वती पर कृपा करते थे॰ घरवालों के दबाव डालने पर उन्होंने 'पी॰ई॰टी॰' का 'फार्म' भर दिया लेकिन जब उसकी परीक्षा का दिन आया तो वे चादर ओढ़कर घर में सो रहे थे ! मम्मी ने डपट कर जगाया और कहा- 'जाओ 'टेस्ट' देने, दो सौ रुपए लगे हैं उसमें॰'  
'पर मेरी तैयारी नहीं है, मैं वहाँ जाकर क्या करूंगा ?' उन्होंने ऊँघते हुए उत्तर दिया॰
'जो बने करो, पर जाओ यहाँ से॰' माँ की डांट पड़ी तो बड़ी अनिच्छा से उठे, कुल्ला किया और मुँह लटकाए चले गए॰ परिणाम आया तो उसमें अत्यन्त निराशाजनक वरीयताक्रम मिला॰ हम सब समझ गए- 'गई भैंस पानी में !'
          उनके कुछ सहपाठियों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया परिणामस्वरूप देश के नामीगिरामी संस्थानों में उन्हें प्रवेश मिल गया, किसी को आई.आई.टी. तो किसी को आर.ई.सी., आपस में ‘पार्टियों’ के दौर चलने लगे. चयनित साथियों को बधाइयां मिलने लगी और शाबासी भी. बधाई के उस दौर का उनके ऊपर कुछ अजब सा असर हुआ, संभवतः उनके मष्तिस्क में आत्मविश्लेषण की प्रक्रिया आरंभ हुई.
          एक दिन हम सब साथ में भोजन कर रहे थे, कुन्तल सोच-विचार में थे. अनायास बोले- ‘पापा, मेरे ये जो चार दोस्त देश के शानदार संस्थानों में 'सिलेक्ट' होकर जा रहे हैं, इन सबसे मैं ज़्यादा होशियार हूं. ये ‘हीरो’ बन  गए, मैं उनके लिए बैठकर तालियां बजा रहा हूं !’
‘हूं, तो फ़िर ?’ मैंने उसे घूरते हुए पूछा.
‘मुझे आप लोग एक साल की छुट्टी देंगे क्या ? समझ लीजिए कम्मू ( उनका घरेलू नाम ) घर में नहीं है.’
‘क्या करोगे ?’
‘अगले साल पी.ई.टी. दूंगा, उसकी तैयारी करूंगा.’
‘एक साल की छुट्टी ‘ग्रान्टेड’.’ हम सबने एक साथ कहा. उस समय उनके चेहरे पर अपूर्व आत्मविश्वास दमक रहा था और हमारा घर अवर्णनीय ऊर्जा से ओतप्रोत हो गया. वह वाक्य- ‘मुझे आप लोग एक साल की छुट्टी देंगे क्या?’- ने उनका ऐसा भविष्य निर्मित किया जिसकी हमें कल्पना भी न थी.

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अलग अलग विषयों और घटनाओ को एक सूत्र में पिरोया है आपने । बहुत बढ़िया ।

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