गुरुवार, 19 जून 2014

9 : कभी धूप कभी छाँव

         
                                                         कहीं धूप कहीं छांव :
                                                         =============


         Stephen R. Covey की एक पुस्तक है: 'The Seven Habits Of Highly Effective People' जिसमें जीवन प्रबंधन के सात अद्भुत सूत्र हैं. इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे दिमाग की नई खिड़कियाँ खोल सकता है. जैसे, इस पुस्तक में प्रभावी सम्प्रेषण के बारे में एक आनुभूतिक चर्चा है. हम लोग 'Sympathy' शब्द से भलीभाँति परिचित हैं जिसका हिन्दी अर्थ है सहानुभूति. अँग्रेजी का एक और शब्द है- 'Empathy' जिसका अर्थ है समानुभूति. स्टीफन का मानना है- सहानुभूति और समानुभूति में फ़र्क है. सहानुभूति, किसी स्थिति से एक समझौता होता है जिसमें मनुष्य की भावुक प्रतिक्रिया होती है. सहानुभूतिवश की गई ऐसी मदद सामने वाले को पराश्रित बनाती है जबकि समानुभूति में यह जरूरी नहीं कि सुनी गई बात से आपकी सहमति हो, बल्कि यह सामनेवाले व्यक्ति को पूरी गहराई से समझने का भावुकतापूर्ण  बौद्धिक प्रयास है. जब हम किसी को सुनते हैं तो इन चार तरीकों से प्रतिक्रिया करते हैं :
# हमारा आकलन > सुनी गई बात से हम सहमत हैं या असहमत ?
# हमारी जांच-पड़ताल > फिर, हम अपनी निश्चित धारणाओं के अनुसार सामने वाले से प्रश्न करते हैं.
# हमारी सलाह > उसके बाद, अपने पुराने अनुभव के आधार पर उसे अपनी राय देते हैं.
# हमारा निष्कर्ष > अंत में, अपनी सोच की कसौटी के आधार पर सामने वाले के व्यवहार और इरादे को समझते की कोशिश करते हैं. 
          स्टीफ़न  के अनुसार- 'जो कुछ कहा जाता है उसका 10% शब्दों के माध्यम से, 30% आवाज के माध्यम से और शेष 60% हमारे शरीर की भाषा से संप्रेषित होता है. समानुभूति में आप केवल कान से नहीं सुनते बल्कि आप अपनी आंखों और दिल से भी सुनते  हैं. आप महसूस करने के लिए सुनते हैं, अर्थ समझने के लिए सुनते हैं, अर्थात 'मैं सामने वाले को समझने के लिए उसे सुन रहा हूँ.'  
          एक घटना आपको बताता हूँ- गर्मी के दिन थे, मैं अपने एक मित्र के घर उनके 'लंच-टाइम' में पहुँच गया. उनका छोटा बच्चा 'डायनिंग चेयर' पर अनमना सा बैठा था, वह भोजन करने का इच्छुक न था लेकिन उसकी माँ उसे भोजन कराने के लिए दृढ़संकल्पित थी. उन्होंने मुझसे भी भोजन करने का अनुरोध किया, मैंने मना किया लेकिन 'कोल्ड-ड्रिंक' के लिए राजी हो गया. फ्रिज से निकलते कोल्डड्रिंक को देख बच्चा मचल गया- 'मैं कोल्डड्रिंक लूँगा.' उसकी सुई कोल्डड्रिंक में अटक गई थी. मामला पेचीदा हो गया. माँ ने बच्चे से वादा किया- 'भोजन कर लो, उसके बाद तुम्हें कोल्डड्रिंक दूँगी, पक्का.'
'नईं, मैं पहले कोल्डड्रिंक लूँगा.' बच्चे ने रोते हुए कहा. माँ ने बहुत समझाया पर बच्चा अपनी बात पर अड़ गया.
'एक काम करो, मैं तुमको कोल्डड्रिंक देती हूँ लेकिन खाने के पहले तुम नहीं पियोगे, हाँ, खाना और कोल्डड्रिंक साथ-साथ ले सकते हो.' दोनों में समझौता हो गया, बच्चा अपने काम में लग गया और बच्चे की माँ हम लोगों की बातचीत में शामिल होने के लिए आ गई. मैंने उनसे कहा- 'भाभी जी, बच्चे की ज़िद इस तरह पूरी करके आप उसे बिगाड़ रही हैं.'
'सच तो यह है भाई साहब, ये सब आपके कारण हुआ.' वे बोली.
'मेरे कारण?'
'हाँ, आपके कारण. आप उसके खाने के समय में आए, उसके नज़र के सामने फ्रिज से कोल्डड्रिंक निकला, ज़ाहिर है, बच्चा उसे देखेगा तो मचलेगा.'
'ओ, सॉरी, पर मैंने देखा कि आपने उसकी बात मानी लेकिन उसने तो आपकी बात नहीं मानी ?'   
'मानी, बराबर मानी, आप देखिए, वह कोल्डड्रिंक पी रहा है, साथ ही खाना भी खा रहा है.'
'उसने आपको झुकाया, फिर खाना खाया.'
'यह झुकने-झुकाने की बात नहीं है. हम दोनों ने एक दूसरे की भावना को समझा.' बच्चे की माँ ने मुझे समझाया. 
            स्टीफ़न की पुस्तक 'द सेवन हैबिट्स ऑफ़ हाइली इफेक्टिव पीपल' का ज़िक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि आपको धनवान बनने के गुर बताने वाली अनेक पुस्तकें बाज़ार में बहुत मिल जाएंगी लेकिन इस रहस्यमयी दुनियाँ में खुद का प्रबंधन कर स्वयं को प्रभावी मनुष्य कैसे बना जाए- यह समझाने वाली पुस्तकें कम मिलती हैं. जब मुझे व्यवहार विज्ञान विषय पर प्रशिक्षण देने के मौके मिलने लगे तब प्रबंधन की अनेक पुस्तकों को पढ़ने का अवसर मिला उनमें से सबसे अधिक प्रभावित करने वाली पुस्तक यही रही. इसे मैंने कई बार पढ़ा, हर बार कुछ नई बात समझ में आती.
          एक कहावत है- 'सिखाने का प्रतिफल सीखना है॰' प्रशिक्षक पहले विषय को पढ़ता है, समझता है फिर उसके बाद समझाता है और समझाते-समझाते ऐसा समझता है जिसे वह केवल पढ़कर नहीं समझ सकता॰ यह ज़रूर हुआ कि इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के चलते इसके कई सूत्र अपने आप मेरे जीवन में जुड़ते गए॰ मुझे मेरी भूलें और कमियां समझ में आने लगी, फिर मेरे जीने का अंदाज़ भी बदलने लगा. 
          सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं- 'पुस्तक में क्या लिखा है वह मायने नहीं रखता, उसे पढ़कर जो आपके दिल में धड़कता है- वह मायने रखता है.'

==========

          एक दिन माधुरी (जी हां, मेरी पत्नी) के साथ मैं अपने मित्र विवेक जोगलेकर के घर गया. उनकी पत्नी शुभदा उन दिनों गर्भवती थी, प्रसव समय अधिक दूर न था. शुभदा के सामान्य स्वास्थ्य की कुशलक्षेम के पश्चात मैंने विवेक से पूछा- ‘शुभदा का ठीक से ध्यान रखते हो?’
‘हां-हां, बराबर ध्यान रखता हूं.’ विवेक ने बताया.
‘मिठाई वगैरह खिलाते हो?’
‘कभी कभी.’
‘चाट-पकौड़ी?’
‘अक्सर.’
‘कोई ‘डायरी मेन्टेन’ करते हो?’
‘क्या मतलब?’
‘तुम्हारी पत्नी आज से बीस-पच्चीस साल बाद तुमसे शिकायत कर सकती है- ‘मैं जब ‘प्रेग्नेन्ट’ थी तब तुमने मेरा बिल्कुल ख्याल नहीं रखा, एक टुकड़ा मिठाई नहीं खिलाई और न ही कभी चाट.'
‘अरे, खिला-पिला रहा हूँ, ऐसे कैसे भूल जाएगी ?’
‘भूल जाएगी मित्र, देख लेना, जैसा बता रहा हूं, वैसा ही होगा॰ इसीलिए हर समय जेब में डायरी रखा करो, जो भी खिलाओ, उसका पूरा विवरण और तारीख लिखने के बाद उसमें शुभदा के दस्तखत करवा लिया करो.’
‘ऐसा क्या?’
‘हां, अगर अभी चूके तो फिर बाद में बेबुनियाद आरोप सुनने और सहने के लिए तैयार रहना.’
          माधुरी और शुभदा दोनों मुझ पर नाराज़ हो गई और तुरन्त मुझे स्त्री विरोधी घोषित कर दिया- ‘क्या हम लोग झूठ बोलती हैं?’
‘नहीं, ऐसा मैंने ऐसा कब कहा?’
‘तुम्हारे कहने का मतलब तो यही है, तुमने तो, सच में, मुझे कुछ नहीं खिलाया. देखो शुभदा, इनकी इतनी बड़ी मिठाई की दूकान, पूरे शहर में ‘पेन्ड्रावाला’ का नाम, क्या मज़ाल कि कभी मिठाई का एक टुकड़ा लाकर खिलाया हो!’ माधुरी ने शिकायती लहज़े में कहा.
‘अब आज मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है कि मैंने तुमको क्या-क्या खिलाया इसीलिए विवेक को यह सावधानी समझा रहा था.’ मैंने कहा.
          ऐसा नहीं है कि पत्नियाँ झूठ बोलती हैं, या भूल जाती हैं. असल में, यह मानवीय सम्प्रेषण की समस्या है. एक मनुष्य दूसरे के हृदय की अनकही बात को सुन नहीं पाता, समझ नहीं पाता. पति-पत्नी एक घर में साथ रहते हैं लेकिन किसी अपरिचित की तरह! दोनों के लिए एक दूसरे को बूझ पाना असम्भव है, असम्भव क्यों? असम्भव इसलिए कि असम्भव को सम्भव करना असम्भव है.
          विवाह करके दो व्यक्ति एक साथ रहने के लिए सहमत होते हैं लेकिन वे दो ही रहते हैं, वे एक कभी नहीं हो पाते. विवाह के शुरुआती मौसम की नज़दीकी कब ऊब में बदल जाती है, पता नहीं चलता. मधुमास या मधुवर्ष में आंखों में आंखे डाले बड़े प्यार से एक दूसरे को भोजन के कौर खिलाते युगल बाद के वर्षों में आंखें नीची कर अपना-अपना पेट भरा करते हैं. तब तक वे दोनों एक दूसरे के बल और छल से परिचित हो जाते हैं और मौन अपेक्षाओं की सीढ़ियां चढ़ते हुए परस्पर व्यवहार को परखते हैं. यदि पत्नी कहे- ‘चाट खिलाओ’, तो पति को खिलाने में क्या असुविधा है- चाहे जितनी खाओ किन्तु पेंच यह है कि पत्नी सोचती है कि- ‘गर्भधारण का असहनीय कष्ट सहकर मैंने तुम्हारी संतान को जन्म दिया और तुम्हें मेरे कहे बिना चाट खिलाने की याद तक नहीं आई?’ उलाहना इस बात का है,  क्या यह अनुचित है ?
          मेरा अनुमान है कि स्त्रियां सबसे अधिक नाखुश अपने पति से रहती हैं. उनकी नाखुशी की वज़ह वज़नदार है- नाराजगी का सबसे बड़ा कारण दोनों में लिंग का अन्तर है जिसके कारण उसे अपना घर छोड़कर दूसरे के घर आना पड़ा. उसके लिए पति नामक व्यक्ति किसी खलनायक की तरह है जिसने उसे उसके मां-बाप के घर से बेदखल कर अपने घर ले आया. वैसे तो समाज लड़कियों को उनके बचपन से सिखाता-समझाता है- ‘एक दिन सपनों का एक राजकुमार आएगा, तुझे डोली में बिठाकर ले जाएगा, बहुत सारी खुशियां देगा, प्यार करेगा, तू वहाँ जाकर राज करेगी’ लेकिन विवाह के बाद स्त्री को समझ में आता है- ‘मैंने तो चांद सितारों की तमन्ना की थी, मुझको रातों की स्याही के सिवाय कुछ न मिला.’
          एक लड़की जिसके सामने खुला आसमान था, अनेक संभावनाएं थी, वह कुछ अपरिचितों के हाथ की मुट्ठियों के अंधेरे में कैद हो गई. विवाह के पश्चात हर गतिविधि के लिए वह ससुरालवालों की इजाज़त की  मोहताज़ हो गई. यहां तक कि उससे यह उम्मीद भी की जाती है कि वह अपने जीवन के स्वर्णिम अतीत के पन्ने फ़ाड़कर फेक दे और मायके वालों को भूल जाए और उनका नाम तक अपने मुंह से न निकाले !
         धीरे-धीरे वह उस जेलखाने की अभ्यस्त हो जाती है, उसी छोटी सी दुनिया में वह अपनी नई दुनियाँ बसाती है, घर के काम में खुद को व्यस्त करके वह इस यातना से अपना ध्यान बँटाने की प्रतिदिन कोशिश करती है. रोज, आँच के सामने खड़े होकर सबके लिए खाना बनाना, जूठे बर्तन उठाना और साफ़ करना, गंदे कपड़े धोना और 'प्रेस' करना और हर रात में वही बेरहम बिस्तर ! कौन है ज़िम्मेदार ?
         फ़्रैंच लेखिका Simone de Beauvoir ने स्त्री-पुरुष संबन्धों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए अपनी पुस्तक The Second Sex में लिखा है- ‘पति सोचता है कि उसने एक अच्छी पत्नी से विवाह किया है. वह स्वभाव से गुणवती, श्रद्धालु, वफ़ादार, संतुष्ट और पवित्र है. वह भी वही सोचती है जो उसके लिए सोचना उचित है. पुरुष एक लम्बी बीमारी के बाद स्वस्थ होने पर अपने मित्रों, रिश्तेदारों और नर्सों को देखभाल के लिए धन्यवाद देता है पर जो पत्नी छः महीनों तक उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है, उससे वह कहता है- ‘मैं तुम्हें धन्यवाद नहीं देता, तुमने तो अपना कर्तव्य निभाया है.’ पति पत्नी की अच्छाइयों को कभी भी विशेष महत्व नहीं देता. समाज भी पत्नी में इस गुण का होना अनिवार्य समझता है. विवाह संस्कार भी यह ज्ञान कराता है कि पत्नी में सद्गुणों का होना अनिवार्य है. पुरुष भूल जाता है कि उसकी पत्नी किसी परम्परा से चली आ रही एक पवित्र रचना मात्र नहीं बल्कि एक जीता-जागता इन्सान भी है.’
           सीमोन द बोउवार के अनुसार- 'स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है.'

 ==========

          हमारी बड़ी बिटिया संगीता ‘पीएमटी’की प्रतियोगिता में दूसरी बार असफल हो गई. बहुत समझाने-बुझाने पर बामुश्किल उसने तीसरी बार कोशिश की, उसे ८२.४ % अंक अर्जित किए फिर भी सफल न हो सकी क्योंकि उस वर्ष की परीक्षा में भिंड-मोरेना के परीक्षा केन्द्रों में खुली नक़ल चली जिसका दुष्परिणाम सम्पूर्ण प्रदेश के अन्य प्रतियोगियों को भुगतना पड़ा. पूर्वनियोजित आरक्षण, फिर नक़ल और 'सेटिंग' ने पूरी प्रक्रिया को ऐसे चक्रव्यूह में बदल दिया जिसे भेद पाना सामान्य वर्ग के प्रतियोगियों के लिए बेहद कठिन हो गया. इस असफलता ने संगीता को अन्दर तक आहत और निराश कर दिया. उसने मुझे 'नोटिस' दी- 'पापा, अब मुझसे पीएमटी में बैठने के लिए कभी नहीं कहना और घर में उसका कोई नाम भी नहीं लेगा.' सब चुप हो गए, लेकिन मैं चुप बैठा नहीं. मैं उसकी योग्यता, कर्मठता और लगन को पुरस्कृत होते हुए देखना चाहता था लेकिन आप तो जानते हैं कि किसी की भी तंगहाली उसके बहुत से सपनों को उजाड़कर दूर खड़े होकर चिढ़ाती है और अंगूठा दिखाकर कहती है- ‘ लेल्ले !’
          आपसे अपने एक अज़ीज़ का ज़िक्र अब तक नहीं कर पाया- वे हैं बीके सर. पूरा नाम बृजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, मूल निवासी- कानपुर, शिक्षा- इलाहाबाद, नौकरी- बिलासपुर, हाल मुकाम- मुम्बई. सन १९६२ में वे बिलासपुर के सीएमडी कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक बन कर आए और लगभग ५५ वर्ष तक यहां रहे फ़िर अपने पुत्र के साथ रहने के लिए मुम्बई चले गए. १९६३ से ६५ तक मैंने अपने ‘ग्रेजुएशन’ के दौरान उनसे अंग्रेजी पढ़ी और उनसे बहुत दुखी रहा क्योंकि वे अंग्रेजी को अंग्रेजी भाषा में पढ़ाते थे. वे जो कुछ पढ़ाते-समझाते थे वह मेरे पल्ले नहीं पड़ता था क्योंकि अपनी अंग्रेजी माशाअल्लाह बर्बाद थी.
          शहर के अन्य गणमान्य नागरिकों की तरह वे भी मेरी मिठाई दूकान के नियमित ग्राहक थे, धीरे-धीरे मन मिल गया तो अंतरंगता बढ़ गई और वे मेरे गुरु-मार्गदर्शक-मित्र बन गए. उनसे नियमित मिलना-जुलना था. उनके घर कोई मेहमान या मित्र आते तो वे मुझसे अवश्य मिलवाते. उनके इलाहाबाद वाले एक मित्र रविन्द्रनाथ गोयल बिलासपुर आए तो वे उन्हें साथ लेकर मेरी दूकान में आए. स्वागत-सत्कार के पश्चात घरेलू चर्चा चल निकली. जब संगीता का पीएमटी प्रकरण मैंने उन्हें बताया, गोयलजी बोले- ‘ये क्या बात हुई, इतना अच्छा ‘स्कोर’ लाने के बाद उसे एक बार और ‘ट्राई’ करना चाहिए.’
‘पर उसे तो पीएमटी के नाम से नफ़रत हो गई है.’ मैंने कहा.
‘मेरी उससे बात करवाइए.’
‘पर जब वह इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहती, तो?’
‘मुझसे मिलवाओ, मैं उससे किसी अन्जान की तरह बात करूंगा और फ़िर अपनी तरफ़ से कोशिश करता हूं.’  उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा.
          अगले दिन मैं संगीता के साथ बीके सर के घर पहुंचा. गप-शप शुरू हुई. कुछ देर बाद गोयलजी ने संगीता से पूछा- ‘तुम क्या कर रही हो?’
‘बीएससी फ़ायनल में हूं.’ वह धीरे से बोली.
‘आगे क्या इरादा है?’
‘क्या बताऊं?’
‘मतलब?’
‘कुछ सोचा नहीं, अब तक पीएमटी के चक्कर में फ़ंसी रही, उसमें हुआ नहीं.’
‘क्यों नहीं हुआ?’
‘मैंने तीन बार कोशिश की, हर बार आगे बढ़कर भी पिछड़ गई, अंकल.’
‘तुम्हारा आखिरी ‘पर्सेन्टेज’ क्या था?’
‘८२.४.’
‘कट आफ़' क्या था?’
‘८४.२.’
‘फ़िर तो तुम्हारा एक बार और ‘ट्राई’ करना बनता है.’
‘मेरी अब हिम्मत नहीं.’
‘अब जब तुम ‘सिलेक्ट’ होने के एकदम करीब खड़ी हो तो हिम्मत हार गई. यह बात ठीक नहीं. कल से तुम्हारी पढ़ाई फ़िर से शुरू होनी चाहिए. मुझे ऐसा लग रहा है कि इस बार तुम्हारा सफल होना पक्का है.’ गोयल अंकल ने उसका हौसला बढ़ाया. बीके सर के घर से लौटते समय संगीता एकदम चुप रही. अगली सुबह संगीता अपनी ‘मोपेड’ में ‘कोचिंग’ जाने के लिए जब घर से निकल पड़ी तो मुझे उसके निर्णय का पता अपने-आप चल गया और उसके आने वाले कल का पूर्वाभास भी हो गया. वह आभास निराधार नहीं था. चौथी कोशिश में वह ‘सिलेक्ट’ हो गई और उसकी उदासी और नैराश्य का स्थान खुशी और आशा ने ले लिया. हमारे घर में सालों के बाद खुशी की कोई खबर आई. हम हंस भी रहे थे, रो भी रहे थे.
          उसी दिन वह अपने दादाजी और दादीजी को प्रणाम करने गई और उनका आशीर्वाद लिया. दद्दाजी ने पूछताछ की और मुझे बुलवाया. उन्होंने मुझसे पूछा- ‘संगीता ‘डाक्टरी’ पढ़ने इन्दौर जाएगी?’
‘जी’ मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
‘तुम कैसे बाप हो, मेरी समझ में नहीं आता!’   
'क्या हुआ ?'
'संगीता कितने साल की हो गई?'
'बीस की होने वाली है.'
'तुमको उसके शादी-ब्याह की फिकर नहीं है !'
'पढ़-लिख लेगी तब शादी करेंगे.'
'कब तक पढ़ेगी, कब उसकी शादी करोगे ?'
'डाक्टर बन जाएगी तब करेंगे.'
'वह अकेले इंदौर में रहेगी, चार साल तक, लड़की जात, तुमको डर नहीं लगता ?'
'डरने की कोई बात नहीं है, जो बच्चे बाहर पढ़ने जाते हैं वे अकेले ही जाते हैं.'
'अब मैं तुमको कैसे समझाऊं?'
'आप मेरी बात समझने की कोशिश करिए दद्दाजी. हमारे पूरे खानदान में आज तक कोई डॉक्टर नहीं बना, संगीता बन रही है, आपकी पोती संगीता. उसे जाने दीजिए, सब ठीक रहेगा, आप चिंता न करें.' मैंने उन्हें समझाया, 'शायद' वे मान गए और इस प्रकार संगीता के इन्दौर जाकर आगे पढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया.
          तमिलनाडु के प्रसिद्ध कवि तिरुवल्लुवर ने लिखा था : 'नदी या झील या तालाब की गहराई कितनी ही क्यों न हो और उसका पानी कैसा भी क्यों न हो, कमलिनी खिले बिना नहीं रह सकती.'

          संगीता को इन्दौर के ‘डेन्टल कॉलेज’ में प्रवेश लेना था, मैं उसके साथ गया. इन्दौर में हम दोनों, मेरी भतीजी ममता अग्रवाल की ससुराल साउथ तुकोगंज में रुके थे. प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी होने के पश्चात ‘हॉस्टल’ देखने गए. हॉस्टल क्या था- किसी घुड़साल जैसा था. अंग्रेजों के जमाने में बने एक बहुत बड़े बंगले को ईटों की दीवार के खंड बनाकर छोटे-छोटे कई कमरों में तब्दील करके मेडिकल कालेज की लड़कियों का हॉस्टल घोषित कर दिया गया था. उस युग की निर्माण शैली के अनुरूप बंगले की छत काफ़ी ऊंची थी इसलिए  आठ फ़ीट की दीवारें उठा दी गई थी, आधुनिक ‘आफ़िसों’ के ‘पार्टीशन’ की तरह, लिहाज़ा, किसी भी पार्टीशन में आपस में हो रही बातचीत, या मच रहा शोर, या बज रहा टेपरेकार्डर सबको एक साथ सुनाई पड़ता था. हर एक कमरे में आठ-आठ लोहे के पलंग लगे थे जिसमें कुछ पलंग बीच से जमीन की तरफ़ घूम गए थे अर्थात जो उस पर सोए उसे नवजात शिशु के झूले का परमानन्द मिल जाए और रात भर सोने के पश्चात कमर भी टेढ़ी हो जाए. साथ में, 'कॉमन बाथरूम', 'किचन' और ‘बोनस’ में `सीनियर्स' का आतंक. किचन में बजबजाती नाली के पास पकाया जा रहा भोजन, वहां की गंदगी और बदबू ने स्वास्थ्य के समस्त मानकों की धज्जियां उड़ा रखी थी. मुझे वह हॉस्टल तनिक भी न जमा लेकिन मेरी जेब में इतने पैसे न थे कि मैं उसका किसी ‘प्राइवेट हॉस्टल’ में दाखिला करवा सकता, मज़बूरन संगीता को वहीं रोकने का निर्णय लेना पड़ा.
          कॉलेज से लौटकर जब हम ममता के घर वापस आए तो ममता के श्वसुर राधारमण जी ने हमारी दिन भर की गतिविधियों की जानकारी ली. जब मैंने उनसे संगीता के लिए हॉस्टल में रहने के बारे में बताया तो वे मुझ पर नाराज़ हो गए- ‘आपने यह ठीक नहीं किया, हमारा इतना बड़ा घर है, यहां कोई तकलीफ़ नहीं, संगीता यहां रहेगी.’
‘शाहजी साहब, उसको यहां कम से कम पांच साल रहना है, कोई दो-चार दिन की बात तो है नहीं!’ मैंने समझाया.
‘तो क्या हुआ, पांच साल रहे तो भी हमें कोई अड़चन नहीं, सब व्यवस्था हो जाएगी.’
‘यह तो आपकी कृपा है लेकिन बात कुछ और है.’
‘क्या है?’
‘हॉस्टल में सब ‘स्टूडेंट्स’ का साथ रहेगा, पढ़ाई का माहौल रहता है. बस, इसीलिए, और कोई बात नहीं. वह आपके घर नियमित आती-जाती रहेगी और मैं उसे आपकी ही देखरेख में यहां छोड़कर जा रहा हूं॰’
‘आप ठीक कहते हैं लेकिन आपका निर्णय हमें पसन्द नहीं आया.’ उनकी आवाज़ में क्षोभ झलक रहा था. रात को भोजन के समय उन्होंने मुझे फ़िर चेताया- ‘हॉस्टल के बारे में आप फ़िर से विचार कीजिए.’ मैंने कृतज्ञ भाव से उनकी ओर देखा, मन ही मन उनकी सज्जनता और उदारता पर मुग्ध होकर मैं चुपचाप भोजन करता रहा.
          अगली सुबह हम सामान लेकर हॉस्टल गए. जैसी रहने और खाने की व्यवस्था थी, उसे देखकर मेरा मन खिन्न हो गया लेकिन संगीता ने कहा- ‘पापा, आप चिन्ता मत करो, कुछ दिन में मुझे इन सब की आदत पड़ जाएगी.’ संगीता को वहां छोड़कर मैं बहुत भारी मन लेकर वापस लौटा. पर क्या करोगे, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.
          संगीता से दो साल छोटी हमारी बेटी संज्ञा ने भी 'पीएमटी' देने का एक प्रयास किया, उसमें असफ़ल हो गई और अपने हाथ खड़े कर दिए- ‘पापा, यह मेरे वश का नहीं.’ हमें समझ में आ गया कि पढ़ने-लिखने और 'कुछ बनने' का उबाऊ काम उन्होंने अपने होनेवाले पति के लिए छोड़ रखा है. उन्होंने स्थानीय विप्र महाविद्यालय में बी.एस.सी. (माइक्रोबायोलोजी) में प्रवेश ले लिया. संज्ञा से दो साल छोटे हमारे पुत्र कुन्तल, सरस्वती शिशु मंदिर में ‘हाई स्कूलिंग’ कर रहे थे. संज्ञा और कुन्तल का पढ़ाई-लिखाई में मन कम लगता था, उन्हें अन्य गतिविधियां अधिक पसंद थी. सच पूछिये तो इन दोनों के भविष्य को लेकर हम लोग बेफ़िक्र हो गए थे. वे जितना पढ़ें ठीक, जो करें ठीक, जो न करें ठीक.
          कुन्तल का मिठाई दूकान में काम करने में बहुत दिल लगता था इसलिए उन्हें जब समय मिलता, दूकान आ जाते या अपने मित्रों के साथ घूमते-फ़िरते. बारहवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने 'पीईटी' की प्रतिस्पर्धा में भाग लिया और अत्यन्त निराशाजनक प्रदर्शन किया. श्रीमानजी के हाल-चाल का एक घटनाक्रम आपके जानने योग्य है- शाला की अर्धवार्षिक परीक्षा में उत्तर-पुस्तिका के एक पृष्ठ में वे अपने ‘आचार्यजी’ का 'कार्टून' बनाते रहे क्योंकि परीक्षाकक्ष में एक घंटा तक रुकना अनिवार्य था! एक घंटा व्यतीत हो जाने के बाद उत्तर-पुस्तिका के उस पृष्ठ को फाड़कर निकाल लिया और कक्ष से बाहर आ गए. घर आकर उन्होंने अपनी करतूत हमें बताई और यह संकेत दिया कि उनका भविष्य कैसा होने जा रहा है!
            कुछ दिनों बाद उनकी शाला से मेरे लिए बुलावा आ गया. प्राचार्या ( प्राचार्य का स्त्रीलिंग- प्राचार्या ! ) ने कुन्तल के बारे में मुझसे शिकायत की और फिर कुन्तल से पूछा- ‘तुमने उत्तर-पुस्तिका कोरी क्यों छोड़ी?’
‘उस दिन मेरी तैयारी नहीं थी, मुझे किसी भी प्रश्न के उत्तर नहीं मालूम थे.’ कुन्तल ने बताया.
‘फ़िर, उसका एक पन्ना क्यों फाड़ा?’
‘एक घंटे का समय बिताना था बहनजी, इसलिए एक रेखाचित्र बना रहा था. उठने के पहले यह समझ में आया कि आचार्यजी चित्र को देखेंगे तो बहुत पिटाई करेंगे इसलिए उस पन्ने को फाड़कर जेब में रख लिया.’
‘क्या यह बड़ी भूल नहीं है?’
‘जी, मुझसे गलती हुई और मैंने आचार्यजी से क्षमायाचना भी कर ली.’ कुन्तल ने कहा. प्राचार्या कुन्तल के कक्षा शिक्षक की ओर मुड़ी और उनसे पूछा- ‘क्यों आचार्यजी, क्या इसने आपको ये सब बताया था?’
‘जी.’ आचार्यजी ने सहमति में अपना सिर हिलाया.
‘आपसे क्षमा मांगी?’
‘जी.’
‘फ़िर आपने अग्रवालजी को क्यों बुलाया?’
‘मैं चाहता था कि यह घटना इन्हें मालूम हो.’ आचार्यजी बोले. तब प्राचार्या ने मुझसे कहा- ‘अब आपको पूरी बात मालूम हो चुकी है, आप बताइए, कुन्तल को क्या दंड दिया जाए?’
‘मेरी सलाह है कि इसे शाला से निष्कासित किया जाए और इसके चरित्र-प्रमाणपत्र पर प्रतिकूल टिप्पणी भी की जाए.’ मैंने कहा.
‘यह आप क्या कह रहे हैं?’
‘बहनजी, शाला नियमों के अनुकूल चलती है. कुन्तल ने अक्षम्य भूल की है. इन्हें अहसास होना चाहिए कि गल्तियों के कैसे परिणाम आते हैं.’
‘आपने तो बहुत कड़क निर्णय बता दिया.’
‘ऐसी बात नहीं है. आप मेरी बात समझिए, ये मेरे घर में इसलिए रहते हैं क्योंकि मेरे पुत्र हैं. इन्हें यदि घर में रहना है तो उसके नियमों और मर्यादाओं का पालन करना पड़ेगा. यदि उनका उल्लंघन होता है तो एक बार समझाऊंगा, फ़िर चेतावनी दूंगा और नहीं माने तो घर से बाहर निकाल दूंगा.’
‘ठीक है, जो हुआ सो हुआ. कुन्तल ने अपनी भूल स्वीकार कर ली और क्षमा मांग ली इसलिए प्रकरण को यहीं समाप्त करते हैं. आपको हमने इसलिए बुलाया था कि यह सब आपको मालूम रहना चाहिए.’
‘मुझे तो यह सब पहले से ही मालूम था.'
‘ऐसा क्या?’ प्राचार्या चौंकी.
‘जी, उसी दिन, जिस दिन पन्ना फाड़ा गया था.’ मैंने कुर्सी से उठते हुए बताया.

==========                         

5 टिप्‍पणियां:

  1. @पुस्तक में क्या लिखा है वह मायने नहीं रखता, उसे पढ़कर जो आपके दिल में धड़कता है- वह मायने रखता है.

    सार यही है।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
  2. अब सही शुरुआत हुई है ।
    धन्यवाद ।


    आपकी बताई पुस्तक भी इबुक के रूप में डाउनलोड कर ली है । आपके अगले लेख से पहले पूरा पढने का लक्ष्य है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या बात है, पढ़कर बताइएगा॰

    उत्तर देंहटाएं