रविवार, 18 मई 2014

8 : जिया जाए न

         
                                                              जिया जाए न :
                                                              =========

          युगों से शासक के शासन का अर्थ है, आतंक बनाकर रखना॰ बीसवीं शताब्दि की शुरुआत में विश्व के देशों में राजतंत्रीय शासन के स्थान पर प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम करने का सिलसिला भी शुरु हो गया था. गुलामी के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले लोग सक्रिय हो चुके थे, साम्यवादी सोच उभर रहा था इसलिए कारखानों के श्रमिकों के लिए तनिक नरमी बरतने के उपाय खोजे जाने लगे. सन 1910 के आस-पास एल्टन मेयो नामक समाजशास्त्री ने ब्रिटेन के एक कारखाने में कुछ प्रयोग करके निष्कर्ष निकाले कि 'ह्यूमन टच' देकर कामगारों से अपेक्षाकृत अधिक काम लिया जा सकता है॰
          प्रभावी नेतृत्व कला पर संपूर्ण विश्व में गहन मनन-चिन्तन चला, नेतृत्व के अनेक तरीके और प्रकार खोजे गए, कई ग्रन्थ लिखे गए. राजनैतिक, सामाजिक, व्यापारिक और पारिवारिक स्तर पर असंख्य प्रयोग किए गए. उन प्रयोगों के माध्यम से रास्ते तलाशे गए ताकि कोई तो चमत्कारिक उपाय पकड़ में आए और उस शैली का अनुसरण करके असरदार नेतृत्व की कला विकसित की जा सके. मुझे लगता है कि अभी भी हम ‘यह करो-या-वह करो’ वाली स्थिति में चक्कर काट रहे हैं.
          मनुष्य का व्यवहार इतना रहस्यपूर्ण है कि किसी क्रिया विशेष पर वह क्या प्रतिक्रिया करेगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है. प्रख्यात समाजशास्त्री अब्राहम मास्लो का मानना है कि मनुष्य को यदि बिना कुछ किए खाने को मिल जाए तो वह बिस्तर से ही नहीं उठेगा. ऐसे आलसियों के समूह से काम लेने का हुनर समझना, रेत से तेल निकालने जैसा दुष्कर कार्य है.
          अपनी बात करूं तो इस विषय पर मुझे अनेक प्रशिक्षण देने के अवसर मिले. जितना मैं पढ़ पाया, जान पाया, समझ पाया- अपनी शक्ति और योग्यता भर मैंने इस विषय को प्रभावी बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिश की, हजारों को गुर बताए हैं लेकिन सच तो यह है कि मैं स्वयं को इस कला में असफ़ल मानता हूं. मेरी पत्नी मेरा कहना नहीं मानती और न ही मेरे तीनों बच्चे. यदि कभी कुछ मान गए तो वह मेरे लिए अहोभाग्य  का सबब होता है. यदि कभी, अपनी बात मनवाना आवश्यक होता है तो मुझे किसी राजनीतिज्ञ की तरह उस मुद्दे पर उनसे बात करके यह पूर्वानुमान लगाना पड़ता है कि ‘बात मानी जाएगी या नहीं?’ यदि मेरे समझ में आता है कि बात मान ली जाएगी तो आदेश प्रसारित करता हूं और यदि अवमानना की संभावना होती है तो चुप रहकर अपना सम्मान बचा लेता हूं. इसे आप ऐसा भी मान सकते हैं कि मेरी 'लीडरशिप' का दारोमदार सामनेवाली की मर्जी पर टिका है. सामने वाला मेरी बात मान जाए तो चमक गई और न माने तो भसक गई! जैसा हाल मेरा चल रहा है क्या संसार के शासन, प्रशासन और प्रबन्धन में वैसा चल सकता है?
           मैं बचपन से ही अपने बाबाजी, दद्दाजी के अत्यधिक कड़क स्वभाव की छाँव में पला-बढ़ा. घर में रहो या दूकान में या स्कूल में, आतंक का साया हर जगह मँडराते रहता था. स्कूल में भी कुछ बदमाश सहपाठी मुझे सताते रहते, 'चिकना' कहकर मेरे गाल सहलाते और अमर्यादित व्यवहार करने की कोशिश करते॰ डरते-डरते मैं इतना अधिक डरपोक हो गया था कि डरने से भी डर लगने लगा था. किसी से भिड़ जाऊँ- ऐसी हिम्मत नहीं होती थी इसलिए 'बच के चलो रे बाबा'- का स्वभाव विकसित होता गया जो आज तक कायम है॰
         संसार ऐसा है कि सबको डराकर रखो या डरकर रहो॰ मुझे यह समझ में आया है कि नेतृत्व करने के लिए डराने की कला सीखना ज़रूरी है क्योंकि जब तक आप में सामने वाले को आतंकित करने या तकलीफ पहुंचाने का माद्दा नहीं है, वह आपका कहा नहीं मानेगा॰ मुरली की धुन का प्रभाव अलग है और सुदर्शन चक्र का अलग॰  
          जब मैं वयस्क हुआ, जिम्मेदारियाँ आई तो नेतृत्व के अवसर बढ़ गए. घर या कार्यस्थल में मुंह बनाकर रहना, त्यौरियां चढ़ाना, आंखें तरेरना और गुर्राना मुझे अनुचित लगता था इसलिए हर परिस्थिति में मैंने खुशनुमा माहौल बनाकर काम करने का तरीका अपनाया, भले ही काम थोड़ा कम हो॰ ऐसा नहीं है कि दबाव डालकर काम कारवाने का प्रशिक्षण मुझे न मिला हो, मैं वह आसान तरक़ीब अपना सकता था लेकिन वह तरीका मुझे पढ़े-लिखे इन्सान का तरीका नहीं लगता था॰  शायर निदा फ़ाज़ली की नज़्म है :

"सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो.
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो.
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम सम्हल सको तो चलो.
यही है जिन्दगी कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो."

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          सन १९९४ में मुझे अपने शहर की लालबहादुर शास्त्री शाला विकास समिति का अध्यक्ष मनोनीत किया गया. मैं राजनीति में सक्रिय कार्यकर्ता नहीं था, फ़िर भी बिलासपुर के तात्कालीन विधायक श्री बिसाहूराम यादव, जो मध्यप्रदेश शासन के मंत्री भी थे, मेरे अंतरंग थे, ने उस स्कूल के विकास का जिम्मा मुझे सौंपा जहाँ मैंने अपनी किशोरावस्था में सात साल पढ़ाई की थी॰
           सबसे अधिक चिन्ताजनक स्थिति थी- छात्रों की संख्या. २५ कमरे वाले स्कूल में, दो पारियों में, केवल  ६५० छात्र ! उस खूबसूरत इमारत के हर कमरे का चूने वाला पलस्तर उखड़ रहा था, सालों से रंग-रोगन नहीं हुआ था, ‘इलेक्ट्रिक वायरिंग’ व पंखे छात्रों की दुष्टता से ध्वस्त होकर लटक रहे थे, ब्लेकबोर्ड सफ़ेद पड़ गए थे, बच्चों के नए सत्र में प्रवेश के समय कुछ शिक्षक और कार्यालय लिपिक बेलौस घूसखोरी करते थे, पढ़ाई-लिखाई 'टरकाऊ' चल रही थी, आदि अनेक समस्याएं थी. हमारी शाला में दो ऐसे बेख़ौफ़ शिक्षक थे जो स्कूल में केवल ‘पे-डे’ पर तनख्वाह वसूलने आते थे, उन्हें स्कूल आने और बच्चों को पढ़ाने से जैसे सख्त नफ़रत थी लेकिन उनकी राजनीतिक पहुंच और ‘न्यूसेन्स वेल्यू’ के समक्ष प्राचार्य लाचार थे. लेकिन मात्र तीन माह में ईमानदारी और निष्ठा ने मिलजुलकर प्रयास किया और बहुत कुछ सुधर गया, स्कूल की शक्ल बदल गई, माहौल बदल गया.
          एक दिन मैं स्कूल के किसी काम से नगरनिगम दफ़्तर गया था. दिवंगत प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की प्रतिमा टाउनहाल के कमरे में उपेक्षित सी पड़ी थी, मूर्ति के चेहरे पर एक धूलधूसरित बोरा बंधा हुआ था. पूछताछ करने पर पता चला कि वह मूर्ति दो-तीन साल से लावारिस पड़ी है. मैंने तुरन्त निगम के प्रशासक श्री राजीवरंजन से बात की, उन्हें समझाया कि स्कूल का नाम ‘लालबहादुर शास्त्री उच्चतर माध्यमिक शाला’ है इसलिए उस प्रांगण में शास्त्रीजी की प्रतिमा स्थापित करना उचित रहेगा. वे मान गए और ‘पोडियम’ तथा अन्य निर्माण व्यय निगम के द्वारा वहन करने के आदेश भी दे दिए. आर्किटेक्ट से हमने आकर्षक डिजाइन बनवाई, एक माह की अवधि में काम पूरा हो गया, २ अक्टूबर १९९४ को लालबहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर अनावरण का कार्यक्रम तय हुआ. सोचा कि उस अवसर पर मूर्तिकार का सम्मान भी किया जाए इसलिए जब मैं मूर्तिकार के घर उन्हें निमन्त्रित करने गया तो मालूम पड़ा कि उस मूर्ति की बनवाई का भुगतान उसे निगम से प्राप्त नहीं हुआ है तो उसकी व्यवस्था भी शाला विकास समिति ने कर दी. इस प्रकार लालबहादुर शास्त्री की उस उपेक्षित प्रतिमा को सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित किया जा सका.
          ऐसा न समझें कि सब ठीक ही रहा. शिक्षकों के एक गुट को शाला के विकास और पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं था. वे कानाफूसी करने और सहकर्मियों को बरगलाने में सिद्धहस्त थे और पूरे दिन अपनी ऊर्जा इसी काम में लगाते थे. प्राचार्य मेहरोत्रा से तो जैसे उनकी पिछले जन्म की दुश्मनी थी इसलिए उनकी गतिविधियों पर प्राचार्य की और प्राचार्य पर उनकी सतत दृष्टि लगी रहती थी. यह कार्य सास-बहू के परस्पर लगाव की तरह शाला के अन्य कार्यों में सर्वोच्च वरीयता प्राप्त था. प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर प्राचार्य विरोधी गुट के मुखिया को मैंने कार्यक्रम-प्रस्तोता बना दिया ताकि शाला में वातावरण सौहार्द्रपूर्ण हो सके. मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरे उस प्रयोग से प्राचार्य ऐसा रूठे कि उन्होंने मुझसे अनबोला कर लिया और उस बात को करीब आज ३१ वर्ष बीत चुके हैं, वे अब भी मुझे देखकर अपना मुंह फेर लेते हैं। अब आप अनुमान लगाइए कि उसके बाद शाला विकास कार्यक्रम का क्या हाल हुआ होगा ?
          हमारी समिति के एक उपाध्यक्ष, जो राजनीति में सक्रिय थे, ने मुझसे कहा- ‘मेरे रिश्तेदार की पत्नी (अर्थशास्त्र में एम.ए.) को स्कूल में अस्थाई अध्यापक नियुक्त करना है.'
‘लेकिन हमें तो अंग्रेजी के अध्यापक की ज़रूरत है, जबकि अर्थशास्त्र के हमारे पास पहले से ही तीन हैं, कैसा करें?’ मैंने उनसे पूछा।
‘वह मैं नहीं जानता, मैंने वचन दे दिया है, बहुत जरूरी है.’ उन्होंने कहा. मैंने प्राचार्य से बात की, वे भी मुझसे सहमत थे। हमने उपाध्यक्ष की बात न मानते हुए अंग्रेजी के अध्यापक की नियुक्ति की. फलस्वरूप, उपाध्यक्ष मुझसे रूठ गए और मुझे तानाशाह घोषित कर समिति के अन्य सदस्यों को मेरे विरोध में सहेज लिया॰ 
           शाला विकास समिति के अध्यक्ष का कार्य अवैतनिक होता है, फ़ोकट छाप. अपना काम-धाम छोड़कर समय दो, समस्याओं के समाधान के लिए दिमाग लगाओ, जलनखोरी पर शीतल जल छिड़को, महाआलसी शिक्षकों और बाबुओं से काम लो, ऊधम से मुक्ति के नाम से घर से भगाए गए बालकों को पढ़ाई और खेल से जोड़ो, स्कूल चलाने के लिए आवश्यक धनराशि के लिए बच्चों के अभिभावकों का खून चूसो- जैसी चुनौतियाँ होती है. इसके लिए 'लगे रहो' की मानसिकता होनी ज़रूरी है, मज़बूती चाहिए, लगन चाहिए, और बेशर्मी भी। नेतृत्व कला पर भाषण देना या सलाह देना सरल है लेकिन उसे कार्यरूप में परिणित करना बेहद कठिन है.
           अब आप मेरी दुर्गति समझिए, स्वतन्त्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी प्राचार्य ने मुझे याद करने के काबिल नहीं समझा, झण्डा फहरा लिया, मिठाई खा ली. गाली-गलौच करने की विधा मैंने अपने ‘हलवाई’ जीवनकाल में सीखी थी, मैं दक्ष था, किन्तु सार्वजनिक जीवन में इसका उपयोग करना मुझे अशिष्टता समझ आया. मैं ऐसे कई नेताओं और अफसरों के बारे में जानता हूँ जिनका वाणी-संयम बहुत कमजोर है, उनके इस 'सद्गुण' के कारण उनकी बातें मानी जाती हैं, वे अपने मातहतों से अच्छा काम करवा लेते हैं ! यदि मैं भी उस विधा का उपयोग करता तो क्या प्राचार्य की ऐसी हिम्मत होती कि वह विकास समिति के अध्यक्ष को निमंत्रित किए बिना झंडा फहरा लेता ? 
           वह विधायक या सांसद या मंत्री क्या- जिसका नाम सुनने मात्र से कलेक्टर का अंडरवियर नम न हो जाए ! आप ही बताइए, यह कैसा लोकतन्त्र है ?
           उधर प्राचार्य नाराज, इधर विकास समिति के सदस्य खिलाफ और शाला के शिक्षक और 'ऑफिस स्टाफ' तो हमारी मुस्तैदी से हलाकान थे ही, धीरे-धीरे मेरी पकड़ कमजोर होती गई. इस बीच नगरनिगम के चुनाव हुए, संयोगवश, मेरे बालसखा के पुत्र महापौर बने. एक दिन उन्होंने बिलासपुर नगरनिगम द्वारा संचालित शालाओं के विकास समिति के अध्यक्षों और प्राचार्यों की एक बैठक बुलाई जिसमें मैं भी सम्मिलित हुआ. महापौर की भावभंगिमा और 'शिष्टाचार' का मुझ पर ऐसा असर पड़ा कि मैंने अपनी इज्ज़त का फ़लूदा बनवाने के बदले कदम पीछे खींच लेना उचित समझा और शाला विकास समिति के कार्य को हाथ जोड़कर अपने व्यापार और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में व्यस्त हो गया. बोलो, सियावर रामचन्द्र की जय.

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          सन १९९४ की ही बात है, निर्माणाधीन लाज का काम पूरा हो चला था, ‘फ़िनिशिंग’ चल रही थी. उन दिनों फ़र्श में दाने की टाइल्स लगाने का चलन था जिसे फ़र्श में चिपकाने के बाद उस पर ‘वेक्स पालिश’ की जाती थी जिससे टाइल्स में चमक आती थी. निरीक्षण के दौरान दद्दा जी ने ताज़ा-ताज़ा लगी पालिश पर अपना पैर रख दिया और फ़िसल गए. परिणामस्वरूप उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई जिसकी शल्यक्रिया हुई. वे दर्द न सह पाने के कारण बहुत बेचैन रहे, सारी रात तड़पते थे. लगभग दो सप्ताह अस्पताल में भरती रहकर वे घर वापस आए. दिन-रात परिश्रम करने वाला इन्सान इस तरह लाचार हो गया और चौबीसों घंटे बिस्तर पर पड़े रहने के लिए मज़बूर हो गया. छोटा भाई राजकुमार दद्दाजी के साथ रहता था, उसने दद्दाजी की बहुत सेवा की. दद्दाजी के बिस्तराधीन होने और सक्रियता कम हो जाने के कारण उन्हें पेट साफ़ न होने की समस्या हो गई. एनिमा दिया गया, ईसबगोल की भूसी व अन्य आयुर्वेदिक दवाएं दी गई जिसका असर ही न होता था, एलोपेथी दवा वे लेते न थे इस कारण हर सुबह हाथ में ‘ग्लब्स’ पहनकर उनकी गुदा के छिद्र में उंगली डालकर मल को निकाला जाता. यह कार्य बेहद बदबूदार था. इन्सान को अपने मल की बदबू तो आती नहीं पर दूसरे के मल की गन्ध यदि स्मृति में प्रवेश कर जाती है तो फिर घंटों पीछा नहीं छोड़ती. उस समय मैं संसार की उन सभी माताओं को मन ही मन प्रणाम करता था जो सालों-साल अपने बच्चे का उत्सर्जित मल पोछती हैं, बच्चे का शरीर और उसके पोतड़े व चड्डियाँ धोती हैं और निर्विकार होकर उस दुर्गन्ध का सामना किया करती हैं. धन्य है.
          लाज में दद्दाजी के साथ हुई दुर्घटना ने उस अफ़वाह को मज़बूती दे दी कि लाज में ज़रूर कोई भूत-प्रेत है. लोग चर्चा  करने लगे- 'देखो, भूत ने नाराज होकर सेठजी को पटक दिया.' लॉज का काम शुरू किए बारह साल हो गए थे. ख़रामा-ख़रामा बढ़ रहा काम इस दुर्घटना के कारण लम्बे समय के लिए बन्द हो गया.
          एक दिन दद्दाजी ने मुझे बताया- ‘मैं तुम भाइयों का बंटवारा करना चाहता था॰ इस बारे में बड़े भैया से मैंने अस्पताल में चर्चा की थी.’
‘फ़िर?’ मैंने पूछा.
‘उन्होंने मना कर दिया, कहा कि हम भाइयों के बीच कोई समस्या नहीं है, हम आपस में बन लेंगे.’
‘तो?’
‘वो कह रहे थे कि रायपुर में मेरे पास पर्याप्त है, मुझे तो कुछ चाहिए नहीं, अब आपका जो कुछ है वह इन्हीं दोनों भाइयों का है.’
‘अच्छा!’
‘तो मैंने कहा कि मैं तो तीनों को देना चाहता हूँ, संपत्ति के तीन हिस्से बनेंगे, फ़िर तुम अगर नहीं चाहिए तो अपना हिस्सा भाइयों को दे देना, ठीक कहा न?’
‘आपने सही कहा.’ मैंने हामी भरी.
          पिता-पुत्र के इस वार्तालाप को सुनकर मेरे मन में सवाल उठा कि बड़े भैया समर्थ हैं और वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं जबकि उन दिनों मैं और छोटा भाई राजकुमार, हम दोनों गम्भीर आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे. हमारे संकट को बड़े भैया भलीभांति जानते हैं, फ़िर भी, उन्होंने बंटवारे के लिए क्यों मना कर दिया? यह मेरे लिए आज भी रहस्य है॰
          समय बीतने के साथ-साथ यह बाद में समझ में आया कि हमारे कष्टमय जीवन का भुगतान शेष था जिसे हम अपने प्रारब्ध में लिखाकर लाए थे. जो कुछ होना था वह बिना घटे कैसे रह सकता था? घर से निकाले जाने के दस साल पूरे हो चुके थे, मेरी नैया प्रतिदिन धीरे-धीरे डुबक रही थी. मेरी नाव में मेरी पत्नी, तीन बच्चे, बढ़ते बच्चों की पढ़ाई का खर्च, मुझ पर चढ़ा कर्ज़, कर्ज़ पर ब्याज़ और मेरी अर्थ-अर्जन की अयोग्यता का निरन्तर बढ़ता वजन था जो हमारी गृहस्थी की नाव के लिए असहनीय हो गया था किन्तु मैं असहाय हो चला था. सच तो यह है कि इसके बाद जो कुछ हुआ, उसी ने इस आत्मकथा की भूमिका तैयार की अन्यथा मेरी भी कथा दुनियां के अन्य लोगों की तरह चिता की आग में जलकर भस्म हो जाती या ज़मीन में दफ़्न हो जाती.


शायर मजाज़ लखनवी के चंद अशआर पेश हैं :

"हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ॰
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ?

ये रुपहली शाम, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल॰
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ?

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं॰
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ?

जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ॰
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ?"

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          बड़ी बेटी संगीता उन दिनों बारहवीं यानी ‘हायर सेकेन्डरी’ के अंतिम वर्ष में थी. एक दिन उसने मुझसे कहा- ‘मेरी कुछ सहेलियां ‘पी.एम.टी.’ दे रही हैं, मैं भी देना चाहती हूं.’
‘सुना है कि ‘सलेक्शन’ 'टफ' है, कर लोगी?’ मैंने पूछा.
‘मालूम नहीं लेकिन मैं इस प्रतिस्पर्धा की गहराई और अपनी क्षमता को नापना चाहती हूं.’ उसने उत्तर दिया.
          बारहवीं की परीक्षा में उसे अच्छे अंक मिले लेकिन पी.एम.टी. में उसका प्रतिशत बहुत कम आया किन्तु इस प्रयास में उसे यह अनुमान लग गया कि अगली बार में निकाल लेगी. उसने ‘डाक्टर’ बनना तय कर लिया  इसलिए पूरे मनोयोग से उस तैयारी में भिड़ गई. समझा-बुझाकर स्थानीय सी.एम.डी.कालेज में बी.एस.सी.के प्रथम वर्ष में प्रवेश करवा दिया लेकिन उसने कालेज जाने से साफ़ इंकार कर दिया- ‘पापा, मैं कालेज नहीं जाऊंगी, यदि कालेज गई तो पी.एम.टी. नहीं हो पाएगा.’
'ठीक है, मत जाना परन्तु वार्षिक परीक्षा में तो बैठ जाओगी न ?' मैंने पूछा.
'उस समय बताऊँगी.' जवाब मिला.
        प्रत्येक शाम छः बजे वह स्थानीय ‘नेशनल कोचिंग’ में तीन घंटों का मार्गदर्शन लेने जाती थी, घर लौटते रात के साढ़े नौ बज जाते थे. एक दिन उसने मुझसे शिकायत की- ‘पापा, रात को कोचिंग से वापस लौटते समय पांच-छः लड़के ‘हीरो-होंडा’ में मेरी ‘लूना’ के अगल-बगल मुझे घेर कर मित्रविहार के मुंहाने तक आते हैं, रास्ते भर छेड़ते हैं, भद्दी बातें करते हैं. मैं बहुत दिनों से परेशान हूं. आप कुछ करिए.’
‘ठीक है, कल से कोचिंग जाना छोड़ दो.’ मैंने कहा.
‘ये क्या पापा, फ़िर कैसे पी.एम.टी. दे पाऊंगी?’
‘क्या करना? घर में रहो, झाड़ू-पोछा करो, खाना बनाओ, तुम डाक्टर बनने लायक नहीं.’
‘मैं नहीं समझी, ये आप क्या कह रहे हो?’
‘यही, कि ऐसे ही लड़के तुमको पढाई के दौरान मेडिकल कालेज में मिलेंगे, जब डाक्टर बन जाओगी तो अस्पताल में मिलेंगे, फिर बाज़ार में मिलेंगे. तुम्हारी रक्षा के लिए मैं तुम्हारे साथ कहां-कहां फ़िरूंगा? यह मेरे वश का नहीं है.’
‘तो?’
‘इनसे निपटने के रास्ते खुद खोजो, हिम्मत दिखाओ, डरोगी तो ऐसे लोगों का कैसे सामना करोगी? अपना  प्रभामंडल ऐसा बनाओ कि किसी की ऐसा करने की दम ही न पड़े.’
‘मैं समझ गई.’ संगीता ने उत्तर दिया. उसके बाद उसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की.
           रात को सोते समय अचानक घर का दरवाजा खुलने की आहट होती तो मैं जागकर देखता कि कड़कड़ाती ठंड है, सुबह का पौने चार बजा है, सुबह की पहली पाली में बिटिया को ‘फ़िजिक्स’ की कोचिंग में प्रधान सर के घर समय के पांच मिनट पूर्व पहुंचना है; सड़क सुनसान है, अंधेरा है, कंपकंपी है परन्तु इन सबकी कोई परवाह नहीं, उसे बस, एक ही धुन थी- लक्ष्य हासिल करने की.
          संगीता जैसे लाखों युवा अभिलाषी डाक्टर बनने की ज़द्दोज़हद में दिन-रात किताबों और ट्यूशन क्लास से जूझ रहे थे. उनके लिए वैवाहिक या जन्मदिन के कार्यक्रमों में शरीक होना, घूमना-फ़िरना, सिनेमा-टीवी देखना, हंसना-बोलना- सब स्वयं-प्रतिबन्धित था क्योंकि वे जानते थे कि प्रतियोगी परीक्षा में सफ़लता प्राप्त करने में ये सब रोड़े हैं. उनकी ज़िन्दगी में किताबें, नोट्स, कोचिंग और पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं रह गया था.
         मुझे मालूम था कि आर्थिक रूप से समर्थ कुछ अभिभावक दस से पचास लाख तक ‘डोनेशन’ देकर अपने बच्चों को मेडिकल कालेज में भेज रहे हैं परन्तु मुफलिसी के चलते मेरे लिए ऐसी बात सोचना तक पाप था. यह भी सबको ज्ञात था कि कुछ ऐसे भी प्रतियोगी हैं जिन्हें केवल ३०% अंक मिले हैं फिर भी वे आरक्षण सुविधा का लाभ लेकर मेडिकल कालेज पहुंच गए लेकिन उनसे दोगुना से अधिक अंक पाने वाले टुकुर-टुकुर ताक रहे थे. हमारी बेटी तो 'सामान्य वर्ग' वाले कुल में जन्म लेने की अपराधी थी, वह भला कैसे प्रवेश पा जाती? अविभाजित मध्यप्रदेश में केवल छः मेडिकल कालेज थे, इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, रीवाँ और रायपुर जिसमें सभी वर्गों के लिए कुल ७२० 'सीट' थी जिसमें से केवल २७३ सीट सामान्य वर्ग के लिए 'आरक्षित' थी. इन्हें हासिल करने के लिए हर वर्ष साठ से सत्तर हजार छात्र-छात्राएँ अपनी योग्यता का आकलन करवाते. वे अपना सपना साकार करने के लिए दिन-रात पढ़कर तैयारी करते ताकि एक दिन वे डाक्टर बनें, अस्पताल में काम करें, रोगियों की सेवा करें लेकिन आप तो जानते हैं- सपने हैं सपने, कब हुए अपने, आंख खुली और टूट गए ! बहुत कम लोग सफल होते थे और शेष युवा उस दुर्धर्ष प्रतियोगिता में असफल  होने के लिए जैसे अभिशप्त थे. अपनी अकूत मेहनत और मूल्यवान समय को बर्बाद होते देख वे चुपचाप आँसू बहाते, हिम्मत हार जाते और अपने अभिभावकों को भी रूआँसा कर देते.
          मेरी अपनी जान-पहचान में कई ऐसे बच्चे थे जो पढ़ने में बहुत तेज थे, मेडिकल कॉलेज में पढ़ने की काबिलियत रखते थे लेकिन इस प्रवेश प्रतियोगिता में सफल न हो सके फ़लस्वरूप वे अपनी योग्यता के अनुरूप ‘केरियर’ न बना सके और समाज उनकी सेवाओं से वंचित रह गया. उनमें से अधिकांश शिक्षाकर्मी बनकर अपनी प्रतिभा और योग्यता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं या अपने बच्चों को गोद में खिलाते हुए अपनी महत  उपलब्धि पर खिसिया कर हंसने का अभिनय रहे हैं.

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          इस आत्मकथा को पढ़कर आपके दिमाग में यह प्रश्न आ सकता है कि यह कथालेखक जानकार और होशियार समझ तो आता है लेकिन इसके बावज़ूद यह व्यक्ति अपने जीवन को मनोनुकूल क्यों नहीं बना पाया? मानव व्यवहार प्रबन्धन का ऐसा प्रशिक्षक जो अपने प्रस्तुतीकरण के प्रभाव से लोगों में आत्मविश्वास भर देता है, उनमें ऊर्जा का संचार कर देता है, वह अपने जीवन प्रबन्धन में इस कदर फ़िसड्डी क्यों रह गया ? क्या केवल भाषण देना आता है? जब खुद पर उन बातों को लागू करना हो तो फिर सिट्टी-पिट्टी क्यों गुम हो जाती है?
           यह सच है कि अनुवांशिकता के कारण व्यापार करने के गुर मेरे रक्त में सहज प्रवाहित हैं इसलिए फ़ुटपाथ में भी अगर कुछ बेचने के लिए बैठ जाऊं तो अपना धंधा बढ़िया चला लूंगा. तो फिर यह सब परेशानियाँ क्यों?
          असल में, मेरी असफ़लता और तकलीफ़ें मेरे संकोची स्वभाव का दुष्परिणाम है. आप ऐसा न समझें कि मैं सरल स्वभाव का सीधा-सादा इन्सान हूं. 'मो सम कौन कुटिल, खल, कामी; जेहि तन दियो ताहि बिसरायो, ऐसो नमकहरामी !'
        एक सच्ची घटना बताता हूं, इसे पढ़िए. पुरानी बात है, यही कोई पैंतीस वर्ष पुरानी, मेरे एक मित्र हैं- क्रांति कुमार ओझा, जो 'प्रिंटिंग प्रेस' चलाते हैं, ज्योतिष का ज्ञान रखते है. एक दिन मैंने उनसे आग्रह किया- ‘ओझा जी, कुन्डली देखकर मेरा भविष्य बता दीजिए.’ उन्होंने मुझसे कुन्डली मंगवाई और पन्द्रह दिन बाद मिलने का आदेश दिया. जब पन्द्रह दिन बीत गए तो मैं जिज्ञासु भाव लिए उनके पास गया. उन्होंने मुझसे कहा- ‘यार द्वारिका, अपन दोनों एक मोहल्ले में धंधा करते हैं, कई सालों से मैं तुम्हें जानता हूं. मैं अब तक तुम्हें एक सीधा-सादा व्यक्ति मानता था, आम लोगों में भी तुम्हारी 'इमेज' ऐसी ही है लेकिन मैं तुम्हें एक  बात बताता हूँ, नाराज नहीं होना मित्र.'
'बताइये, निःसंकोच बताइये.' मैंने उत्सुक होकर पूछा.
'तुम्हारी कुन्डली में बैठे ग्रह कुछ और बताते हैं.’
‘क्या ?’
‘तुम्हारी कुन्डली में स्पष्ट संकेत हैं कि तुम बहुत बदमाश ‘टाइप’ के आदमी हो.’
'महाराज, यह बात अभी तक केवल मुझे ही मालूम थी. इस बात को जानने वाले अब आप संसार के दूसरे व्यक्ति हो गए हैं. किसी और को मत बताना, प्रभु.’ मैंने उनसे प्रार्थना की.
           मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड मनुष्य के व्यक्तित्व को समुद्र में तैरते 'आइसबर्ग' की तरह अबूझ बताते हैं. पानी में तैरती बर्फ की चट्टान का केवल छोटा सा ऊपरी हिस्सा हमें दिखाई पड़ता है जबकि उसका बहुत बड़ा हिस्सा पानी में डूबा रहता है जो दिखाई नहीं पड़ता इसी प्रकार किसी भी मनुष्य के बाह्य स्वरुप को देखकर उसकी वास्तविकता को समझ पाना या उसके समग्र व्यक्तित्व को जान पाना असंभव है. इन्सान होता कुछ और है, दिखता कुछ और ! 
          मेरे संयुक्त परिवार में सम्प्रेषण सदैव एक-तरफ़ा रहा. बड़ों का काम बोलना और छोटों का काम 'जी-जी' करना. आम तौर पर अधिकांश परिवार इसी शैली को अपनाते हैं. इसीलिए सम्प्रेषण अधूरा रह जाता है क्योंकि सबको अपनी बात कहने या राय देने की आज़ादी नहीं होती. परिवार में जो आजीविका कमाता है या जो सबको डराकर रखता है- वही होशियार है शेष सब उसके आज्ञाकारी. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि डरावने माहौल या अपनी अवमानना के भय से अन्य सदस्य अपने विचार या भावनाएं प्रगट नहीं करते जो किसी परिवार के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं. मेरे दद्दाजी भी मुझसे राय लिया करते थे लेकिन इस अदा से- 'छोटे भइया, हमने तुम्हारी शादी जबलपुर में तय कर दी है, तुम्हारा क्या कहना है?' अब न तो मैंने उनसे शादी के सम्बन्ध में कुछ कहा था, न लड़की ही देखी थी, न उससे बात की थी फिर भी मुझे अपनी राय देनी थी! मैंने कहा- 'जैसा आप उचित समझें.' मेरे कहने का अर्थ संसदीय भाषा में यह है कि प्रस्तावक ने प्रस्ताव पटल पर रखने के पूर्व ही निर्णय ले लिया है और वह केवल अनुमोदन चाहता है.
         एक उदाहरण पढ़िए- एक माँ अपनी पांच वर्षीय बेटी के साथ मॉल में घूम रही है. अचानक बच्ची का ध्यान 'टॉय शॉप' में रखी एक गुड़िया की ओर जाता है, बच्ची का दिल उसे पाने के लिए मचल जाता है. वह अपनी माँ से उस गुड़िया को खरीदने का आग्रह करती है लेकिन माँ उसे झिड़क देती है- 'मैं इसीलिए तुमको बाज़ार लाना पसंद नहीं करती. तुम्हें जो दिख गया वह खरीदना है. ऐसा करोगी तो फिर मैं तुम्हें अपने साथ नहीं लाऊंगी.' 
'मम्मी, एक मिनट रुकना, मैं आई.' बच्ची ने अपनी माँ से कहा और दौड़कर शॉप के अंदर गई. सेल्समेन से उस गुड़िया को बाहर निकालकर दिखाने के लिए कहा. बच्ची ने उस गुड़िया को अपने दोनों हाथों से थामा, प्यार से देखा, 'किस' किया और उसे वापस करते हुए सेल्समेन को कहा- 'थैंक्स अंकल.'
          अब, इस घटना से बच्ची ने क्या अनुभव किया होगा ? यही न, कि भविष्य में वह अपनी भावनाएँ माँ से न बताए क्योंकि माँ नाराज़ होती है, उसे सजा भी मिल सकती है. अगर ऐसी घटनाएँ बार-बार होती हैं तो यह संभव है कि दोनों के बीच भविष्य में संवादहीनता की स्थिति बन जाए. ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाएं कालान्तर में पारस्परिक स्नेह, विश्वास और मधुर सम्बन्धों की स्थापना में बाधक सिद्ध हो सकती है.
         मेरे परिवार में केवल मेरी माँ थी जो मुझसे और सबसे बराबर प्यार करती थी. घर के अन्य बड़ों का स्थायी भाव किसी पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल जैसा था, केवल सुनने की आज़ादी थी, कहने की नहीं. इन बातों का मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि कोई भी प्रतिक्रिया करने में संकोच का अनुभव करता था और मैं स्वभाव से दब्बू  बनता गया. संवाद की सुविधा न होने के कारण मैं एक अपने परिवार के लिए 'रोबो(ट)' की भांति हो गया और 'जो आदेश....' की मुद्रा में जकड़ गया.
         आप ऐसा न सोचें कि इस कथा के जरिए मैं अपनी तकलीफ़ों का बोझ आपको बता कर खुद को हल्का करने की कोशिश कर रहा हूँ॰ दरअसल, मैं जानना चाहता हूँ कि हम सब जिस आनंदमय जीवन के लिए तरसते हैं वह हमसे यूँ दूर क्यों होते जाता है ? शायर गुलज़ार लिखते हैं :

"तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं.

जीने के लिए सोचा ही नहीं, दर्द सम्हालने होंगे
मुस्कुराए तो मुस्कुराने के क़र्ज़ उतारने होंगे,
मुस्कुराओ कभी, तो लगता है जैसे होठों पे कर्ज़ रखा है.

ज़िन्दगी तेरे गम ने हमें रिश्ते नए समझाए
मिले जो हमें, धूप में मिले, छाँव के ठंडे साए.

आँख अगर भर आई है बूंदें बरस जाएंगी
कल क्या पता, किनके लिए, आँखें तरस जाएंगी,
जाने कब गुम हुआ, कहाँ खोया, एक आँसू जो छुपा कर रखा था.

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं."

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2 टिप्‍पणियां:

  1. Yadi insaan ye seekh jaaye ki aap doosron ko nahin badal sakte swayam ko to badal sakte ho to jindagi baut aasan ho jati hai.

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  2. वीणा जी, यही रास्ता है पर कितना कठिन है !

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