रविवार, 9 नवंबर 2014

14 : अर्द्ध विराम

                                                                   अर्द्ध विराम
                                                                   =======

          विलियम बटलर यीट्स की कविता का एक अंश :

          'But I, being poor, have only my dreams 
          I have spread my dreams under your feet,
          Tread softly,
          For, you tread on my dreams.'
            
          'गरीब होने के कारण मेरे पास केवल मेरे सपने हैं,
          उन सपनों को मैंने तुम्हारे कदमों तले बिछा दिए हैं,
          संभल के चलो
          क्योंकि तुम मेरे सपनों को रौंद रहे हो॰'

          जीवन में जब भी मैंने कोई निर्णय लिया- सोच-विचार कर लिया, जो भी किया- जो उचित लगा वह किया फिर उन्हें गलत या सही घोषित करने की गुंजाइश कहाँ है ? सच पूछिए तो हमारे निर्णय न तो सही होते और न ही गलत, वे मात्र निर्णय होते हैं। मनुष्य की भूमिका में केवल निर्णय लेना हमारे हाथ में है लेकिन परिणाम कभी-कभार मनमाफ़िक आते हैं तो कई बार मन को संताप देने वाले। ऐसा होता तो वैसा हो जाता, वैसा होता तो ऐसा हो जाता- इस तरह सोचने से क्या मिलेगा ? जो हुआ, वही तो होना था।
          जीवनयापन करना कोई कठिन बात नहीं है, पेट है- तो भरेगा ही लेकिन कोई भी मनुष्य हो, जीवन को यूं ही नहीं जीना चाहता। सबके सपने होते हैं, लक्ष्य होते हैं, अभिलाषाएँ होती हैं जिन्हें हासिल करने के लिए वह कोशिश करता है- चाहे हासिल हो, या, न हो ! मैं अपने संयुक्त परिवार से मिल-जुल कर जीना चाहता था, जिसमें मेरी खुशियाँ भी उनके साथ रहना चाहती थी लेकिन दोनों का तालमेल नहीं बैठा। मेरी समझ में यह आया कि यदि कोई अपने सलीके से जीना चाहता है तो संयुक्त परिवार उसके लिए सही 'प्लेटफार्म' नहीं है; उसे उस बाधा से सही समय पर दूर हो जाना चाहिए।
          संयुक्त परिवार की व्यवस्था मेरे लिए न उपयोगी सिद्ध हुई और न ही सुखदायक। वह समय परिवार से जुड़कर रहने का समय था। उन दिनों शिक्षा का महत्व कम था, खास तौर से व्यापारियों के परिवारों में पढ़ाई-लिखाई को समय की बर्बादी माना जाता था। मैंने तो स्वयं को अपने परिवार की गैर-जानकारी में किसी सिद्ध चोट्टे की तरह पढ़ाई से जोड़े रखा, बिलकुल उसी तरह, जिस तरह हम लोग छुप-छुप कर सिनेमा जाया करते थे।
          अपना बचपन सिसक-सिसक कर बिताया, जवानी जी-जान लगाकर काम करते, व्यापार करते बिताई लेकिन हाथ में आया- शून्य बटा अंडा ! जिस घर में मैं पैदा हुआ, जहां बड़ा हुआ, शादी हुई, बच्चे हुए, सुख-दुख देखे, अनुमान यह भी था कि इसी घर से मेरी मिट्टी उठेगी - उस घर को अत्यंत पीड़ादायक परिस्थितियों में छोड़ना पड़ा, क्यों ?
          मेरे जो सपने थे उन्हें मैंने अपने परिवार के ताने-बाने में बुना था। एक धागे की मानिन्द मेरा अस्तित्व अलग से नहीं था, पता नहीं उस वस्त्र में मैं कहाँ विलीन था लेकिन वह दिन भी आया जब मैं उस वस्त्र का हिस्सा नहीं रह गया, खींचकर निकाल दिया गया एक उपेक्षित धागे मात्र की तरह। जिनके कदमों तले मैंने अपने सपने बिछाए थे वे मुझे कुचलते हुए कहीं दूर खड़े हो गए और चुपचाप मेरा तमाशा देखते रहे।
       
          'हद-ए-शहर से निकली तो गाँव-गाँव चली
          कुछ यादें मेरे संग पाँव-पाँव चली, 
          सफ़र जो धूप का किया तो तज़ुर्बा हुआ
          वो जिन्दगी ही क्या जो छाँव-छाँव चली.'

        मेरी कहानी अभी भी खत्म नहीं हुई है, जिन्दगी ज़ारी है, जद्द-ओ-जहद जारी है। जिंदगी का क्या है, जब तक सांस है तब तक मजबूरी है। इन पथरीले रास्तों पर चलना अगर ज़िंदगी है तो यह रास्ता बहुत बचा है। आपसे बहुत कुछ बतियाने का मन कर रहा है लेकिन अभी इतना ही। इसके आगे की कहानी में और भी 'ट्विस्ट' हैं जो थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। इसके बाद की ज़िन्दगी के किस्से आपको और बताऊंगा, जरा सांस ले लूँ।
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                                                    ( समाप्त : पल पल ये पल )

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके जितना तो नहीं पर जितना अनुभव भी है वो यही की हर समय जो हमें उचित लगता है वही फैसले लेते हैं अब वो हमारे लिए सुखदायक होते हैं या दुखदायक वो समय की बात है ।


    हाँ हम एक दुसरे को सलाह ऐसे लेते देते रहते है जैसे हम बिल गेट्स/महात्मा गाँधी/मदर टेरेसा हों । और हम ही सही कह रहे हैं ।


    खैर



    सांस लेके जल्दी आइयेगा ।
    लम्बी सांस लेके ज्यादा िइन्तजा ररजकरवाइयेगा ।

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    उत्तर
    1. 'हाँ हम एक दुसरे को सलाह ऐसे लेते देते रहते है जैसे हम बिल गेट्स/महात्मा गाँधी/मदर टेरेसा हों और हम ही सही कह रहे हैं' > यह सही है।
      यह 'पल पल ये पल' का समापन पृष्ठ है, आत्मकथा का नहीं, वह यथावत चलती रहेगी।

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