शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

1 : ऐसा भी होता है

                                                      ऐसा भी होता है :
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          हमारे जीवन की यादों की बारात जब स्वागत द्वार के समीप होती है तब तक बारात की उछल-कूद, नाचना-गाना, बेंड-बाजा और गहमा-गहमी शान्त हो चुकी होती है; नाचने वाले थक जाते हैं, दूल्हा थक जाता है, घोड़ी थक जाती है और इंतज़ार करते-करते दुल्हन भी थक जाती है। जीवन की बारात में, जवानी में सब ओर हरियाली नज़र आती है लेकिन जब बुढ़ापा जीवन का स्पर्श करता है तब लाचारी बढ़ती है। बुढ़ापा सहारा खोजता है और सहारा देने वाले, सहारा न दे सकने के बहाने। कृष्ण बलदेव वैद के नाटक 'हमारी बुढ़िया' के कुछ अंश पढ़िए :

'सच तो यह है कि हम अपनी माँ से नफ़रत करते हैं.
उसकी महक हमें पसंद नहीं,
उसकी बहक हमें पसंद नहीं,
उसकी पोशाक हमें पसंद नहीं,
उसकी खूराक़ हमें पसंद नहीं,
उसकी खाँसी हमें पसंद नहीं,
उसकी हँसी हमें पसंद नहीं,
उसका गाना हमें पसंद नहीं,
उसका रोना हमें पसंद नहीं।

उसकी कहानियों से उबकाई होती है,
उसकी शिकायतों से ऊब होती है,
उसकी शेखियाँ हमें पसंद नहीं,
उसके आदेश हमें अखरते हैं,
उसके पकवान हमें जंचते नहीं,
उसके उपदेश हमें पचते नहीं,
उसके ढंग हमें ढोंगी नज़र आते हैं,
उसके रंग भड़कीले नज़र आते हैं,
उसकी बोलियाँ हम समझ नहीं पाते,
उसकी भाषा हम बोल नहीं पाते,
उसकी ढाल में सुस्ती है,
उसका सोच पुराना है,
और ये नया ज़माना है,
सच तो यह है कि वह दकियानूस है,
हमें ये सब सच बोलने वाले नहीं चाहिए।

तो क्या यही हमारी माता है ?
पास जाकर देखना चाहिए,
पास गए तो फिर पीछे हटना मुश्किल होगा,
वैसे ही मान लेना चाहिए,
मान लेंगे तो कुछ करना ज़रूरी हो जाएगा,
मिसाल के तौर पर इसे घर ले जाना,
इसकी देखभाल करना,
इसे दवा-दारू देना,
इसके बाल बनाना,
नाखून काटना,
इसे सैर कराना,
इससे बातें करना,
इसकी बात मानना,
इसकी बातें सुनना,
और उनको सहना,
और उनको समझना,
(क्या) ये सब हमसे हो पाएगा ?"

             मेरी माँ को सन 1966 में गर्भाशय में केन्सर हुआ था, सर्जरी सफल रही और उनकी ज़िन्दगी मज़े से चलती रही। कुछ वर्षों बाद उन्हें 'डायबिटीज' ने आ घेरा, फिर 'हाई ब्लड प्रेशर' हो गया, 'किडनी' में दोष आ गया और बुढ़ापा भी आ पहुंचा। नियमित दवा, चार-छः दिन के अंतराल में डॉक्टर को घर लाकर उन्हें दिखाना, उनके अशक्त होते शरीर और मन को सम्हालना। वहीं पर, दद्दाजी सत्तर वर्ष के हो गए थे, स्वस्थ थे, आवाज़ कड़क, गुस्सा बेमिसाल और मष्तिष्क पूर्णतः जागृत, प्रतिदिन भोजन के अतिरिक्त एक पाव मलाई और आधा सेर गाढ़ा दूध पीते थे।
           परिवार में मंझले होने की दुर्दशा वही जानता है जिसने मंझलापन झेला हो। आम तौर पर वह 'फ़ुटबाल ग्राउंड' के फ़ुटबाल की तरह होता है जिसे दोनों टीमों के खिलाड़ी लतियाते हैं; उसे गोल में भेजा जा सकता है लेकिन वह गोल कर नहीं सकता। वह पर्वतों के मध्य वृष्टिछाया के क्षेत्र की भाँति सदैव सूखे का शिकार रहता है। पौराणिक आख्यान रामायण में लक्ष्मण और भरत मंझले होने के कारण ही उपेक्षित और 'अन्डर-असेस' हुए। मेरा विचार है कि संसार के समस्त मंझले लड़कों और लड़कियों को 'यूनियन' बनाकर अपनी दुर्दशा के विरुद्ध आवाज़ उठाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि बड़े या छोटे को कष्ट न होते हों, उनकी तकलीफ वे जानें परन्तु मैंने एक भाई का छोटा और एक का बड़ा बनकर भी देखा है- जो मुसीबत मंझले पर आती है वह अवर्णनीय है।
          मैं अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारी समझता था पर घटनाएँ ऐसी प्रतिकूल घट रही थी कि मेरा घर में टिके रहना मुश्किल होता जा रहा था। एक दिन घर छोड़ने का दिन आ ही गया। दद्दाजी ने कहा- 'तुम अपनी कहीं अलग व्यवस्था कर लो।'
          ऐसी धमकी वे कई बार दे चुके थे लेकिन मेरा कर्तव्यबोध उसे अनसुना कर दिया करता था परन्तु इस बार मैंने उसे गंभीरता से ले लिया, फ़ैसला ले लिया कि अब इस घर में नहीं रहूँगा- बहुत निभा लिया। मैं इतना दुखी था कि जिस परिवार को मैंने अपना जीवन सौंप दिया, अपनी अभिलाषाएँ समर्पित कर दी, मुफ्त के नौकर की तरह सेवाएँ दी, उस तेरह कमरे वाले तीन मंजिला घर में ऐसी परिस्थितियों ने घर बना लिया कि उसमें हमारे लिए जगह न बची। आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठ रहा होगा- 'आख़िर ऐसा क्या हुआ ?'
          यदि मुझे इस कथा में काल्पनिक घटनाओं को भी साथ में पिरोना होता तो 'आत्मकथा' नहीं, एक साधारण कहानी लिखनी थी जिसमें घटनाक्रम किसी छद्म नाम के नायक के आसपास घूमते रहता जैसे अज्ञेय की 'शेखर एक जीवनी' या धर्मवीर भारती की 'गुनाहों का देवता' आदि। उस स्थिति में लेखक की कलम बेधड़क चलती है वह कुछ भी लिख सकता है परन्तु मैं इस कथा में अपने नाम का उपयोग कर रहा हूँ इसलिए स्वयं को सीमाबद्ध करना ज़रूरी है। दूसरों पर गलतियां थोप कर स्वयं को निर्दोष बताना- राजनीति में चलता है लेकिन परिवार-नीति में नहीं। चलिए, मैं मान लेता हूँ कि ज़रूर मेरी ही गलतियां रही होंगी जो 'मेरे घर-परिवार' से अलग होने की नौबत सामने आ गई।
           माधुरी को जब मैंने अपना निर्णय सुनाया तो वे भौंचक रह गई- 'अरे, ये कैसी बात  कर रहे हो ?'
'दद्दाजी ने घर से जाने के लिए कह दिया।' मैंने बताया।
'सुबह मैंने दद्दाजी को नाराज होते सुना था पर वह तो रोज की बात है। वो तो तुमको आज के पहले दस बार घर से निकालने की बात कह चुके हैं, आज तुम्हें क्या हो गया है ?'
'माधुरी, अब मेरा इस घर में बने रहना मुझे दुष्कर लग रहा है, मैं नहीं रहूँगा।'
'क्या बात करते हो ?' वे मुझ पर बिगड़ गई- 'अम्मा को कौन सम्हालेगा, दद्दाजी को कौन देखेगा, खाना कौन बनाएगा ? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या ?'
'नहीं, अब इस घर से मेरा दाना-पानी खत्म, मैंने किराए का एक घर देख लिया है।'
'नहीं, तुम फिर से सोचो, अभी गुस्से में हो, ये तुम ठीक नहीं कर रहे हो।' माधुरी ने मेरा प्रतिवाद किया।
          सोचते-समझते, अपने धैर्य की परीक्षा देते मैं सैंतीस वर्ष का हो गया था। ये अतीत सहते-निभाते बीता, अब माधुरी कह रही हैं- 'तुम फिर से सोचो'।  क्या अब भी सोचने के लिए कुछ और बचा है ?
          मैं अपने परिवार का ही अंग था, अपने-पराए का कोई भाव मेरे मन में कभी नहीं आया। 'पेंड्रावाला' में मैंने मालिक की हैसियत से नहीं, वरन अपने पारिवारिक व्यापार के 'ट्रस्टी' की भूमिका में परिश्रम और ईमानदारी से काम किया। इस बीच ऐसी अनेक पारिवारिक परिस्थितियाँ बनी जिसके कारण हमारा उस घर में रहना असहज हो गया। कुल मिलाकर उन सब के समवेत प्रभाव से मेरे 'गृह निष्कासन' की पटकथा तैयार थी, केवल मंचन शेष रह गया था।
         मेरा जिस परिवार में जन्म हुआ, जिनके सहयोग से मैं बड़ा हुआ, जिनके साथ मैं सैंतीस वर्षों तक जुड़ा रहा- उस परिवार से दूर होने का समय आ पहुँचा। जब तक परिवार में रहा, यथाशक्ति परिवार के लिए काम करता रहा, निस्पृह भाव से। मैं सोचता था कि 'गब्बर खुस होगा, सबासी देगा' लेकिन गब्बर ने कहा- 'ले, अब गोली खा।'
         दद्दाजी ने घर से जाने के लिए कह दिया, मैंने घर छोड़ने का निर्णय ले लिया, माधुरी ने पुनर्विचार का अनुरोध किया लेकिन घर मेरे लिए यातनागृह बन चुका था, मैं मुक्त होना चाहता था।
         मुक्त तो होना चाहता था लेकिन सवाल ये था कि जाऊँ कैसे ? उसी घर में मेरा जन्म हुआ था, उसी वृक्ष की छाँव में बचपन बीता, युवा हुआ, विवाह हुआ, हमारे बच्चे हुए, क्या उससे विलग होना आसान है ? एक दिन बीता फिर दो, तीन, चार, पांच और छः दिन लेकिन घर से जाने की हिम्मत न हो। मेरी हालत यह थी कि न निगलते बन रहा था, न उगलते।
         एक दिन दद्दा जी ने माधुरी के गहने अम्मा के माध्यम से वापस करवा दिए, घर के सब गहने उनकी 'कस्टडी' में रहते थे। रात को जब मैं घर आया तो माधुरी ने मुझसे पूछा- 'तुमने गहने के लिए कहा था क्या ?
'नहीं।' मैंने बताया।
'तो फिर दद्दाजी ने मेरे गहने क्यों भेजे ?'
'मुझे पता नहीं हैं।'
'फिर मैं क्या करूँ ?'
'भेजे है तो रख लो, बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं, वैसे ही स्थिति विस्फोटक है, ऐसे में अर्थ का अनर्थ हो सकता है।'
'तुमने क्या सोचा ?'
'सोच लिया, अब इस घर में नहीं रहना।'
'तो फिर अटक क्यों गए हो ?' माधुरी ने प्रश्न किया। उसके प्रश्न के उत्तर में मैं रो पड़ा। जब मेरा रुदन शांत हो गया तो उसने पूछा- 'क्या हुआ ?'
'मैं इस घर से कैसे जाऊं, तुम बताओ ? मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा, मैं तो सोचता था कि इस घर से मेरी अर्थी निकलेगी।'
'तो मत जाओ, मैं तो तुमको कब से कह रही हूँ।'
         वे सो गई, मैं बेचैन था, नींद नहीं आ रही थी। मैंने पान की पुड़िया खोली, उसमें से एक पान निकाल कर खाया और आचार्य रजनीश के प्रवचन की एक पुस्तक पढ़ने लगा। लगभग दो घंटे बीत गए, किसी प्रसंग को समझाते हुए आचार्य ने एक उदाहरण दिया- 'जानते हो कि बहेलिया पक्षी को कैसे पकड़ता है ? पेड़ की शाखा में वह बांस की एक पतली डंडी को एक विशेष ढंग से इस तरह बांधता है कि जैसे ही पक्षी उस पर बैठता है, बांस की डंडी उलट जाती है इसलिए पक्षी भी उलटा हो जाता है। उलटते ही वह उसे और अधिक जोर से पकड लेता है, वह भूल जाता है कि उसके पास पंख है जिसकी सहायता से वह उड़ सकता है, भाग सकता है, बच सकता है लेकिन भय उसे वैसा समझने का अवसर नहीं देता और इसी कारण वह बहेलिया की पकड़ में आ जाता है।'
         उस समय रात को डेढ़ बज चुके थे, माधुरी गहरी नींद में थी, मैंने उन्हें जगाया, वे चौंककर उठी और पूछा- 'क्या हुआ ?'
'कल अपन ये घर छोड़ देंगें।'
'इतनी रात को यह बताने के लिए जगाया ?'
'तुम्हें अभी बताना ज़रूरी लगा।'
         2 मई 1984 को दोपहर भोजन के पश्चात हमने अपने और बच्चों के कपडे दो सूटकेस में भरे, हम सब ने बारी-बारी अम्मा के पैर छुए, वे रो पड़ी। हमारे साथ नीचे दद्दाजी के पास आई और उनसे कहा- 'रोका इन्हीं, बहू सुबह से लेकर रात तक घर में लगी रहत ह, इनखर कारन तुम्ही खांय का मिलत ह य जई तो मोसे कुछू न होई, मोरे भरोसे तुम्ही खिचिड़ियौ न मिली।'
         दद्दाजी गुस्से में थे, कोई जवाब नहीं दिया। हमने उनके पैर छुए और चुपचाप अपने तीनों बच्चों के साथ घर से निकल गए।
         मैं अपना घर छोड़कर दुखी भी नहीं था, प्रसन्न भी नहीं। जैसे मेरे उस घर से जुड़े दुःख और सुख उसी क्षण विलीन हो गए। समय ने बड़ा निर्णय लिया था, संभवतः वह मुझे अपनी कसौटी में कसना चाहता था।
         गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की बांग्ला काव्य रचना 'गीतांजलि' की कविता 'बिपदा मोरे रोक्खा कोरो' ने मेरा आजीवन साथ दिया :   
                                                            
'प्रभो ! विपत्तियों से मेरी रक्षा करो'- यह प्रार्थना लेकर तेरे द्वार पर नहीं आया,
विपत्तियों से भयभीत न होऊं- यही वरदान दे।

अपने दुःख से व्यथित चित्त को सान्त्वना देने की भिक्षा नहीं मांगता,
दुखों पर विजय पाऊं, यही आशीर्वाद दे- यही प्रार्थना है।
तेरी सहायता मुझे न मिल सके तो भी यह वर दे कि
मैं दीनता स्वीकार करके अवश न बनूँ।

संसार के अनिष्ट-अनर्थ और छल-कपट ही मेरे भाग में आए हैं,
तो भी मेरा अंतर इन प्रताड़नाओँ के प्रभाव से क्षीण न हो।
'मुझे बचा ले'- यह प्रार्थना लेकर मैं तेरे दर पर नहीं आया,
केवल संकट सागर में तैरते रहने की शक्ति मांगता हूँ।

'मेरा भार हल्का कर दे'- यह याचना पूर्ण होने की सान्त्वना नहीं चाहता,
यह भार वहन करके चलता रहूँ- यही प्रार्थना है।
सुख भरे क्षणों में मैं नतमस्तक होकर तेरे दर्शन कर सकूँ किन्तु,
दुःख भरी रातों में जब सारी दुनियां मेरा उपहास करेगी
तब मैं शंकित न होऊं- यही वरदान चाहता हूँ।'

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          सन 1950 में बिलासपुर के तात्कालीन डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) मक़बूल अहमद खां ने अखिल भारतीय कविसम्मलेन और मुशायरे की नींव रखी। अपने कार्यकाल में उन्होंने हर वर्ष दो दिन के लगातार कार्यक्रम करवाए जिसमें देश भर से नामी कवियों और शायरों को आमंत्रित किया जाता था। स्थानीय म्युनिस्पल स्कूल के मैदान में पच्चीस हज़ार लोगों के लिए बैठकर कार्यक्रम का आनंद लेने की व्यवस्था पी.डब्ल्यू.डी.के जिम्मे होती थी। उन दिनों टेन्टहाउस तो थे नहीं, शामियाना लगाने में दो सप्ताह लग जाते थे। बारिश से बचने के लिए रेल्वे के पार्सल आफिस से तारपोलिन, वनविभाग से बल्लियाँ और बाँस, स्कूल व धर्मशालाओं से दरी आदि का जुगाड़ होता था, इस प्रकार श्रोताओं के बैठने का इंतजाम किया जाता था। शहर के आसपास के सौ-पचास मील तक लोगों को कानों-कान खबर पहुँच जाती और वे इष्टमित्रों सहित बिलासपुर पहुँच जाते, रात भर रस-विभोर होकर सुनते और अत्यंत अहोभाव से कवियों, शायरों और मक़बूल अहमद खां साहब को मन-ही-मन आशीष देते अपने घर वापस चले जाते। 
          उसके बाद ऐसे आयोजनों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर नगर की विभिन्न गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव समितियाँ तथा कुछ नागरिक भी कविसम्मेलन आयोजित करने के लिए आगे आए जिनके सौजन्य से मेरे जैसे हज़ारों रसिक श्रोताओं ने भारत के उत्कृष्ट कवियों और शायरों को सुना। उस युग के 'सुपर स्टार' थे- गोपालदास 'नीरज' जिन्हें सुनने के लिए लोग कांपती ठण्ड में भी पूरी रात बैठे रहते और उनसे कविता सुनते। उनकी कविता- 'ऐसी क्या बात है, चलता हूँ अभी चलता हूँ; इक गीत ज़रा झूम के गा लूं तो चलूँ' और 'कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे'- को सुनना और महसूस करना- अद्भुत अनुभव होता था. उनकी लेखनी की बानगी पढ़िए :

                                        " स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से


          सन 1963 में, जब मैं वाणिज्य स्नातक के प्रथम वर्ष में था, कवि बाबा नागार्जुन ने हमारी कक्षा में आकर कविता पाठ किया था. उस समय मेरी तुच्छ बुद्धि को यह समझ में न आया कि किस महान विभूति को मैं साक्षात सुन और देख रहा हूँ। 
          सन 1964 में अपने कॉलेज में ही मैंने कवि इन्दीवर को सुना-

                                      'एक तू न मिला सारी दुनियां मिले भी तो क्या है,
                                      मेरा दिल न खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या है।'

                                              'कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे,
                                              तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे;
                                              तब तुम मेरे पास आना प्रिये,
                                              मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा, 
                                              तुम्हारे लिये।'

          सन 1968 में विधि महाविद्यालय के वार्षिकोत्सव में मुझे डा.हरिवंशराय बच्चन को सुनने का सौभाग्य मिला। उन्होंने अपनी 'मधुशाला' सुनाई, एक लोकगीत भी सुनाया- 'जाओ लाओ पिया, नदिया से सोन मछरी'. उनकी इस कविता की गहराई को आप भी महसूस करें :

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा !

यह चाँद उदित होकर नभ में /  कुछ ताप मिटाता जीवन का / लहरा-लहरा यह शाखाएँ / कुछ शोक भुला देती मन का / कल मुर्झानेवाली कलियाँ /  हँसकर कहती हैं मगन रहो / बुलबुल तरु की फुनगी पर से / संदेश सुनाती यौवन का / तुम देकर मदिरा के प्याले / मेरा मन बहला देती हो / उस पार मुझे बहलाने का /  उपचार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

2
जग में रस की नदियाँ बहती / रसना दो बूंदें पाती है / जीवन की झिलमिल सी झाँकी /  नयनों के आगे आती है / स्वरतालमयी वीणा बजती /  मिलती है बस झंकार मुझे / मेरे सुमनों की गंध कहीं / यह वायु उड़ा ले जाती है /ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये / ये साधन भी छिन जाएँगे / तब मानव की चेतनता का / आधार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

3
प्याला है पर पी पाएँगे / है ज्ञात नहीं इतना हमको / इस पार नियति ने भेजा है / असमर्थ बना कितना हमको /
कहने वाले, पर कहते है / हम कर्मों में स्वाधीन सदा / करने वालों की परवशता / है ज्ञात किसे, जितनी हमको / कह तो सकते हैं, कहकर ही / कुछ दिल हलका कर लेते हैं / उस पार अभागे मानव का /  अधिकार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

4
कुछ भी न किया था जब उसका / उसने पथ में काँटे बोये / वे भार दिए धर कंधों पर / जो रो-रोकर हमने ढोए /महलों के सपनों के भीतर /  जर्जर खँडहर का सत्य भरा /  उर में ऐसी हलचल भर दी / दो रात न हम सुख से सोए / अब तो हम अपने जीवन भर / उस क्रूर कठिन को कोस चुके / उस पार नियति का मानव से / व्यवहार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

5
संसृति के जीवन में, सुभगे / ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी / जब दिनकर की तमहर किरणें / तम के अन्दर छिप जाएँगी / जब निज प्रियतम का शव, रजनी / तम की चादर से ढक देगी / तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी / कितने दिन खैर मनाएगी / जब इस लंबे-चौड़े जग का / अस्तित्व न रहने पाएगा / तब हम दोनों का नन्हा-सा 
संसार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

6
ऐसा चिर पतझड़ आएगा / कोयल न कुहुक फिर पाएगी / बुलबुल न अंधेरे में गा गा / जीवन की ज्योति जगाएगी / अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर /  ‘मरमर' न सुने फिर जाएँगे / अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन 
करने के हेतु न आएगी / जब इतनी रसमय ध्वनियों का /  अवसान, प्रिये, हो जाएगा / तब शुष्क हमारे कंठो का / उदगार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

7
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन / निर्झरिणी भूलेगी नर्तन / निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल' / सरिता अपना ‘कलकल' गायन / वह गायक-नायक सिन्धु कहीं / चुप हो छिप जाना चाहेगा / मुँह खोल खड़े रह जाएँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण / संगीत सजीव हुआ जिनमें / जब मौन वही हो जाएँगे / तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का / जड़ तार न जाने क्या होगा ! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा !

8
उतरे इन आखों के आगे / जो हार चमेली ने पहने / वह छीन रहा, देखो, माली / सुकुमार लताओं के गहने / दो दिन में खींची जाएगी / ऊषा की साड़ी सिन्दूरी / पट इन्द्रधनुष का सतरंगा / पाएगा कितने दिन रहने / जब मूर्तिमती सत्ताओं की /  शोभा-सुषमा लुट जाएगी / तब कवि के कल्पित स्वप्नों का / श्रृंगार न जाने क्या होगा!

 9
दृग देख जहाँ तक पाते हैं / तम का सागर लहराता है / फिर भी उस पार खड़ा कोई /  हम सब को खींच बुलाता है / मैं आज चला तुम आओगी / कल, परसों सब संगी साथी / दुनिया रोती-धोती रहती / जिसको जाना है, जाता है / मेरा तो होता मन डगमग / तट पर ही के हलकोरों से / जब मैं एकाकी पहुँचूँगा / मँझधार, न जाने क्या होगा !

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, 
उस पार न जाने क्या होगा !"
        
          वे दिल को छू लेने वाले गीत थे, आज भी वे शब्द, उनके स्वर मेरे मनमस्तिष्क में अंकित हैं। गीत वे  नहीं होते जो गाये जाते हैं या सुने जाते हैं या पसंद किए जाते हैं बल्कि गीत वे होते हैं जिनसे पीछा छुडाना श्रोता के लिए मुश्किल हो जाता है। कवि सम्मेलन सम्पन्न हो जाता है, मुशायरा ख़त्म हो जाता है, कवि, शायर और श्रोता अपने-अपने घर चले जाते हैं लेकिन वे गीत इन्सान का पीछा करते रहते हैं।
         किशोरावस्था की उत्सुकता, यौवन की हलचल और प्रौढ़ावस्था की परिपक्वता का सम्पूर्ण सार कविगण अपनी कविता और शायर अपनी शायरी में पिरोया करते हैं। न जाने कैसे, उन्हें हमारे दिल का हाल पता चल जाता है ? आप भी यदि ऐसी कविता लिखते हैं या शायरी करते हैं तो मेरा सलाम क़बूल करें।
          हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवियों में जयशंकर 'प्रसाद', सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, नागार्जुन, 'हरिऔध', भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध जैसे अनेक कवियों ने अपनी-अपनी शैली के अनुसार कवितायें रची और साहित्य जगत में सुस्थापित हुए परन्तु जनलोकप्रियता की कसौटी पर वे कमजोर पड़े। मंचीय कवितापाठ ने जब सामान्यजन को कविता से जोड़ा तब ही कविता लोकप्रिय हुई और कवि भी। आज़ादी की लड़ाई में संलग्न योद्धाओं की स्मृति में रची गई कविता, भारत की स्वाधीनता से प्रभावित होकर लिखी गई राष्ट्रोत्थान की कविता, पड़ोसी देशों के विवाद से प्रेरित उन्मादी कविता, युवाओं के दिल को छूने वाली श्रृंगार व वियोग की कविता, समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करती कविता, आमजन की असुविधा पर टिप्पणी करती कविता, स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार को उकेरती कविता, दलितों व गरीबों के दुःख-दर्द को प्रक्षेपित करती कविता ने भारतवासियों की मनोभावना को जैसे शब्द दे दिए।
          मंच कवितापाठ के आकर्षण से कोई न बच सका, सबने अवसर खोजे, अपनी रचनाएं पढ़ी लेकिन जिनके पास प्रस्तुतीकरण की रोचक शैली थी, वे मंच पर टिके रहे, शेष छिटक कर बाहर हो गए। फिर आया अतुकांत शैली की कविता का युग, जिसके दो हिस्से हो गए; एक- ऐसी कविता जो किसी को समझ में न आए और दूसरी- जो सरलता से समझ में आए। मंचीय कवियों ने दूसरी शैली को अपनाया और कविता लेखन इतना सरल हो गया कि वह सबके लिए आसान हो गया, परिणामस्वरूप कवियों की बाढ़ आ गई। मेरे जैसे अल्पज्ञानी भी कविता लिखने का प्रयास करने लगे जबकि मुझमें कवि का चित्त ही न था।
          देश में व्यापारिक बुद्धिशाली कुछ कवियों ने अपनी दूकान खोल ली, अपने-अपने समूह बना लिए जिसके कारण आयोजक व्यापारी कवि को कवि सम्मलेन का ठेका देने लगे, सबका काम आसान हो गया किन्तु कविता में गिरावट शुरू हो गई। मधुर और संदेशवाहक गीत न जाने कहाँ खो गए, गंभीरता का स्थान चुटकुलेबाजी ने लिया, कवितापाठ कम, भाषणपाठ अधिक होने लगा।

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          आप सोच रहे होंगे कि आत्मकथा में कविसम्मेलन क्यों घुस गया ? दरअस्ल, एक कविसम्मेलन के आयोजन का भार मुझ पर आया था, उसकी याद आई तो बाकी यादें भी साथ चली आई। हुआ ये, कुछ मित्रों के आग्रह पर मुझे पुनः बिलासपुर ज़ेसीज से जुड़ना पड़ा। सन 1981 में धनवृद्धि के उद्देश्य से हमने टिकट बेचकर कविसम्मेलन करवाने का निर्णय लिया। अपने संगठन के 'एक' उपाध्यक्ष को हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा और उनकी टीम को अनुबंधित के लिए दस हज़ार रूपए के साथ दिल्ली भेजा गया। उपाध्यक्ष ने वापस लौट कर सुरेन्द्र शर्मा की आगमन तथा तिथि सहमति का हमें सन्देश दिया। कविसम्मेलन की तैयारी शुरू कर दी गई , रेलवे इंस्टिट्युट का सभागार आरक्षित हो गया, टिकट छप गई, बिक्री आरम्भ हो गई। 
          अचानक एक दिन सूझा कि कवि सुरेन्द्र शर्मा से उनके आगमन कार्यक्रम के बारे में पूछताछ कर ली जाए इसलिए उनको ट्रंककाल लगाया। उनसे जब उनसे बात हुई तो हमारे होश उड़ गए। उन्होंने बताया कि बिलासपुर आने की उनकी कोई 'बुकिंग' नहीं है। उनसे किसी ने संपर्क ही नहीं किया इसलिए कोई अग्रिम राशि भी उन्हें नहीं मिली। उन्होंने बिलासपुर पहुँचने से साफ़ मना कर दिया क्योंकि उसी दिन किसी अन्य कार्यक्रम में उनकी पहले से बुकिंग थी। हम लोग वैसे भी शहर में टिकट बेचने में बहुत गाली खा चुके थे अब जूते खाने की नौबत आ गई थी। सम्बन्धित उपाध्यक्ष को बुलाकर पूछा तो उन्होंने सुरेन्द्र शर्मा को एक भद्दी गाली दी और कहा-'वह झूठ बोलता है।'
'तुमने उनसे दस हज़ार की रसीद ली होगी, वह कहाँ है ?' हमने पूछा।
'इतने बड़े आदमी से भला मैं रसीद कैसे माँगता ? मैं उसके विश्वास में रह गया।' उसने हमें समझा दिया।
           ख़ैर, दस हज़ार को तो बाद में देख लेते, पहले नियत तिथि पर कविसम्मेलन आयोजित करने की समस्या सिर पर थी। दिल्ली के ही एक कवि गोविन्द व्यास से मेरी तनिक जान-पहचान थी, उनका फोन नम्बर पता किया और उनसे बात की, परिस्थिति बताई तो वे बोले- 'फ़िक्र मत करो द्वारिकाभाई, कवि  सम्मलेन होगा और शानदार होगा, मुझे एक दिन समय दो, मैंने अन्य कवियों से बात करके बताता हूँ।'
'आपको एडवांस कैसे भेजें ?' मैंने पूछा।
'ज़रुरत नहीं, आपसे बिलासपुर में ही एक साथ ले लेंगे।' गोविंद व्यास ने कहा। 
          अगले दिन उनका फोन आया, मन प्रसन्न कर देने वाला फोन आया, बजट कम और उत्कृष्ट कवियों का समूह। निर्धारित तिथि पर उनके साथ आ रहे थे- शरद जोशी, ओमप्रकाश आदित्य और जेमिनी हरियाणवी। बात बन गई, नियत तिथि को कविगण बिलासपुर आए और कवितापाठ किया, मज़ा आ गया। धन्यवाद गोविन्द व्यास।
           कार्यक्रम के कुछ समय बाद कवि सुरेन्द्र शर्मा जब बिलासपुर आए तब हमने उनसे भेंट की और दस हजार अग्रिम की चर्चा की तो उन्होंने अपने बच्चे की कसम खाई और बताया कि उनसे किसी ने संपर्क नहीं किया तब हमें समझ में आया कि हमारा सिक्का ही खोटा था. जब अपने 'उपाध्यक्ष' से बात की तो उसने अपनी माँ  की कसम खा ली. दोनों कसमों के बीच हमारा दस हज़ार कहीं खो गया. खैर, जो हुआ सो हुआ, शरद जोशी से मिलकर परम आनंद की अनुभूति हुई. उनके जैसे समृद्धिशाली व्यंग्य लेखक के दर्शन, उनकी सज्जनता और सामीप्य को कभी नहीं भुलाया जा सकता। साहित्यजगत में उनकी प्रतिष्ठा व्यंग्य लेखन की रही, साथ ही वे व्यंग्य के कवि भी थे, इस कविता को पढ़कर आप जान जाएँगे :

 " 'च' ने चिड़िया पर कविता लिखी।
   उसे देख 'छ' और 'ज' ने चिड़िया पर कविता लिखी।
   तब त, थ, द, ध, न, ने
   फिर प, फ, ब, भ और म, ने
   'य' ने, 'र' ने, 'ल' ने
   इस तरह युवा कविता की बारहखड़ी के सारे सदस्यों ने
   चिड़िया पर कविता लिखी।

   चिड़िया बेचारी परेशान
   उड़े तो कविता
   न उड़े तो कविता।
   तार पर बैठी हो या आँगन में   
   डाल पर बैठी हो या मुंडेर पर
   कविता से बचना, मुश्किल
   मारे शरम मरी जाए।

   एक तो नंगी,
   ऊपर से कवियों की नज़र
   क्या करे, कहाँ जाए
   बेचारी अपनी जात भूल गई
   घर भूल गई, घोंसला भूल गई
   कविता का क्या करे
   ओढ़े कि बिछाए, फेंके कि खाए
   मरी जाए कविता के मारे
   नासपिटे कवि घूरते रहें रात-दिन।

   एक दिन सोचा चिड़िया ने
   कविता में ज़िन्दगी जीने से तो मौत अच्छी
   मर गई चिड़िया
   बच गई कविता।
   कवियों का क्या,
   वे दूसरी तरफ़ देखने लगे।"

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          सन 1982 में मुझे बिलासपुर जूनियर चेंबर का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। मैंने इस अवसर का उपयोग नेतृत्वकला सीखने की दिशा में किया और संगठनात्मक प्रबंधन के प्रयोग आरम्भ किए। सदस्य संख्या बढ़ाना, कार्यक्रमों की संख्या और गुणवत्ता में वृद्धि करना, सामान्य एवं कार्यकारिणी सभा की बैठकों में संसदीय प्रणाली लागू करना, व्यक्तित्व विकास के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना, संगठन का आर्थिक आधार तैयार करना, बैठकों में सदस्यों की उपस्थिति संख्या में वृद्धि करना और नगर के युवाओं के विकास के लिए प्रयास करना- इन संकल्पों के साथ मैंने अपनी 'टीम' का गठन किया और स्वयं के साथ अन्य उन्तीस सदस्यों को उस प्रयोग में झोंक दिया।
          वर्ष भर के कार्यक्रमों के बारे में लिखने का कोई विशेष मतलब नहीं निकलता लेकिन यह बताने में मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि मुझे और मेरे अनेक सहयोगियों को उनकी अतिसक्रियता के चलते उनके माता-पिता ने घर से बाहर नहीं निकाला। कर दिखाने की ललक, कर गुज़रने का ज़ुनून और कर लेने के बाद की ख़ुशी- इन सब मनस्थितियों का हमने मिलजुल कर अनुभव किया और वे हमारे जीवन के यादगार दिन बन गए जिन्हें हम कभी न भुला पाएंगे। उसी दौरान एक मित्र मिले, चन्द्रशेखर जालान जो हैदराबाद से बिलासपुर आए और बिलासपुर की एक स्टील फेक्ट्री के महाप्रबन्धक बनकर आए थे। दोस्ती-यारी किसे कहते हैं- यह मैंने उनसे सीखा।
         किशोरावस्था में डेल कार्नेगी और स्वेट मार्टिन की प्रेरणादायक पुस्तकें पढ़कर विदेशों के माहौल और हमारे समाज की सोच की तुलना करके मैं हतप्रभ हो जाता था। कहाँ वे लोग जो मनुष्य को उसकी क्षमता का उपयोग कर आगे बढ़ने का सन्देश देते थे और कहाँ हमारा माहौल- जो सुबह से लेकर रात तक हमारा हौसला गिराने में सन्नद्ध रहते, उस पर भी, तुर्रा ये कि 'हम तुमको सुधार रहे हैं'। अपने बड़े होने का 'एडवांटेज', ज्ञानी होने का भ्रम और समर्थ होने के घमंड में डूबी उस समय की सामाजिक-पारिवारिक सोच ने अनेक उदीयमान पौधों को मुर्झाकर जीने के लिए मज़बूर कर दिया। अपने परिवार, अपने व्यापार; अपनी संपत्ति, अपनी व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन अग्रजों ने असंख्य संभावनाओं में हीनभावना भरकर उन्हें मन मसोसने के लिए मजबूर कर दिया।
          'जेसीज़' के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मुझे वही राह दिखाई पड़ी जो डेल कार्नेगी और स्वेट मार्टिन दिखाया करते थे, मैंने उस राह को अपनाया और मन में संकल्प लिया कि नई पीढ़ी में आत्मविश्वास भरने के लिए मैं प्रशिक्षण कला सीखूंगा और अपनी साँस रहते तक अपने देश के नौजवानों को इस घटिया माहौल से बाहर निकालने का प्रयास करूंगा। अब, मुझे वह मंच मिल गया जहां मुझे अपने जीवन की सार्थकता दिखाई पड़ने लग गई, 'हलवाई' से अलग कुछ और करने और बनने का सूत्र समझ में आ गया।
        
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आज ऐसा लगा जैसे बरगद की छाँव में तसल्ली से बैठने का मौका मिला हो ....आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी आदरणीय

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  2. वन्दना जी, लेख के नीचे 'लिंक' दिया है > आगे पढ़ें … जारी है ……> अगली कड़ियाँ खुलती जाएंगी, आप पढ़ लीजिए।

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