शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

2 : चलती का नाम गाड़ी

         
                                                       चलती का नाम गाड़ी 
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          दद्दा जी के घर में थे तो ‘घर’ में थे, जब बेघर हुए तब समझ में आया कि ‘अपना घर’ क्या होता है! किराए के पहले घर में कुछ दिन रहे फ़िर नेहरू नगर में उससे ज्यादा दिन रहे फ़िर राजेन्द्र नगर में अपने मित्र गजानन खनगन के घर चले गए। यह नया ठिकाना दूकान से तनिक नज़दीक था, रिहाइश पहली मंज़िल में थी। हमारे पड़ोसी खरे जी के बगीचे में लगे अनार के पेड़ की डाल ऊपरी मंजिल तक आ गई थी जो हमारे बेडरूम की खिड़की के आस-पास झूमती रहती। अनार के आकर्षक लाल फूल छोटे-छोटे फल बने और कुछ समय बाद बड़े होने लगे। उन फलों को बढ़ते देखना, एक अलग किस्म का अहसास था। 
          एक दोपहर मैं जब घर पहुंचा तो हमारे पांच वर्षीय पुत्र कुन्तल अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में अपने हाथों में दो अनार लिए खड़े थे। उसने चहकते हुए मुझसे कहा- ‘पापा, अनार।’
‘अरे वाह, कौन लाया?’
‘कोई नहीं, खिड़की के बाहर से हाथ बढ़ाकर तोड़ लिया, मुझसे बन गया।’ उसका चेहरा सफ़लता के भाव से पुलकित था। 
‘चलो मेरे साथ, अपनी चप्पल पहनो।’
‘कहां जाना है, पापा?’
‘सवाल नहीं, चलो।’ मैंने उसे धमकाया, वह कुछ समझ न पाया, मेरे साथ, हाथ में अनार लिए हुए पड़ोसी खरे जी के घर पहुंचा। मैंने कालबेल दबाई, दरवाजा श्रीमती खरे ने खोला और पूछा- ‘आइये अग्रवाल जी, आपने कैसे तकलीफ़ की?’
‘कम्मू ने आपके पेड़ से अनार चुराए हैं, उसे वापस करने आया है।’
‘अनार चुराए हैं, कैसे?’
‘बेडरूम की खिड़की से इसने हाथ बढ़ाकर तोड़े।’
‘तो क्या हुआ, कुछ नहीं होता, बच्चा है।’
‘बच्चा है तो क्या चोरी सीखेगा, आप इन्हें वापस ले लीजिए।’ मैंने उनसे कहा और  कुन्तल को आदेश दिया- ‘कम्मू, आन्टी से माफ़ी मांगो।’ कुन्तल घबराया सा बोला- ‘सारी, आन्टी।’
‘आप बच्चे के साथ अन्याय कर रहे हैं।’ श्रीमती खरे दुखी भाव से बोली।
‘ठीक है, अब आप कम्मू के लिए अनार घर भिजवा दिया करें ताकि उसे इस प्रकार तोड़ना न पड़े।’ मैंने उन्हें विकल्प सुझाया। उसके बाद उनके घर से कम्मू के लिए अक्सर अनार आया करते थे।

           उस घर की कुछ एक बातें और याद आ रही हैं।  मेरे एक मित्र के मित्र हैदराबाद से बिलासपुर आए थे, उनसे मेरी मुलाकात हुई, मैंने उन्हें रात्रि-भोज पर अपने घर में आमन्त्रित किया। रात को लगभग दस बजे वे आए, मैंने उनका स्वागत किया और आदरपूर्वक बिठाया। माधुरी से उनका परिचय करवाया। माधुरी ने मुझे इशारे से किचन में बुलाया और कहा- ‘तुम्हारा ये दोस्त तो ‘पी' कर आया है!’
‘नहीं, ऐसा नहीं होगा, तुम क्या ‘श्योर’ हो?’
‘हाँ, हाँ, उसके मुँह से भभका आ रहा है, एक काम करो, उसे कहीं बाहर ले जाकर खिला दो।’ माधुरी ने सलाह दी।
‘ठीक है।’ मैंने कहा। बाहर आकर मित्र के मित्र से मैंने कहा- ‘चलिए, किसी होटल में डिनर लेंगे।’
‘अरे, क्या हुआ, आपने तो घर में खिलाने के लिए बुलाया था?’ 
‘घर में कुछ अड़चन है, यहां नहीं हो पाएगा।’
‘ये बात गलत है, घर में बुलाया तो घर में खिलाइये।’ उन्होंने फ़िर से इसरार किया। तब तक मुझे गुस्सा आना शुरू हो गया था लेकिन ‘अतिथि देवो भव’ को ध्यान में रखते हुए मैंने आहिस्ता से पूछा- ‘आप ‘ड्रिंक’ लेकर आए हैं क्या?’
‘हाँ, तो?’
‘इस हालत में हमारे घर में कोई घुस भी नहीं सकता, भोजन करना तो बहुत आगे की बात है।’
‘तो आप अपने घर बुलाकर मेरा अपमान कर रहे हैं?’
‘नहीं, मैं तो आपको किसी अच्छे होटल में ले जा रहा हूँ , आप मेरे मेहमान हैं।’ मैंने उसको समझाने का प्रयत्न किया।
‘बस, रहने दीजिए।’ वे नाराज होकर बिना खाए चले गए।

          कुछ ऐसी ही एक घटना और, मेरे एक साहित्यकार मित्र एक दिन मेरी दूकान में आए और उन्होंने बताया- ‘नई कहानी लिखी है लेकिन यहां दूकान में तुम्हारे ग्राहकों के कारण व्यवधान होता है इसलिए तुम्हारे घर आकर आराम से सुनाऊंगा।’ 
‘आज रात को ही घर आ जाओ, वहीं भोजन करना, फ़िर सुनेंगे।’ मैंने कहा। नियत समय पर वे आए, भोजन किया और कहानी शुरू करने से पूर्व बोले- ‘माधुरी को बुला लो, वह भी सुन लेगी।’
‘तुम शुरू करो, जब तक वे भोजन करके आती हैं।’ मैंने कहा। कहानी का वाचन-श्रवण आरम्भ हुआ, कुछ देर में माधुरी भी आकर बैठ गई। उनकी कहानी आगे बढ़ी और थोड़ी देर में बहकने लगी यानी स्त्री-अंग एवं प्रणय-प्रसंग के विवरण प्रविष्ट होने लगे। माधुरी उठी और चली गई। लंबी कहानी थी, किसी प्रकार पूरी हुई और मित्र चले गए। उनके जाने के बाद माधुरी ने मुझे डांटा- ‘तुम्हारे दोस्त को इतनी भी समझ नहीं कि किसी महिला की उपस्थिति में क्या बताना, क्या नहीं बताना?’
‘अब, उसकी कहानी में जो था, उसने बताया।’ मैंने उसका बचाव किया।
‘उनसे बोलो कि अपने परिवार के साथ बैठकर वैसी कहानी उन्हें सुनाया करें, और हाँ, दोबारा से ये आदमी हमारे घर में नहीं आना चाहिए।’ उन्होंने ताकीद की। इस बात को तीस वर्ष होने जा रहे  हैं, तब से उस मित्र का मेरे घर में ‘प्रवेश-निषेध’ चल रहा है।
  
        हमारे मकानमालिक ‘रमी’ के शौकीन थे, वे शहर से बाहर नौकरी करते थे, हर रविवार मित्रगण एकत्रित होते और महफ़िल जमती। कभी ‘कोरम’ कम होता तो मुझे वे आवाज देते- ‘आ जाओ सेठ।’ अपुन भी बैठ जाते थे। न जाने क्या बात थी कि उनके घर में अक्सर मैं ‘प्लस’ में रहता था, जीत के रुपयॊं में से साढ़े छः सौ गिन कर निकालता और वहीं मकानमालिक के हाथ में रखता- ‘लीजिये, इस महीने का किराया।’ वे चिढ़ते और बोलते- ‘ देखो, इस बनिया किरायेदार को देखो, मेरे घर में हम दोस्तों को लूट कर किराया पटाता है।’ ये सच है कि जब तक उनके घर में रहा, मैंने कभी अपने जेब से किराया नहीं भरा, वहीं जीतना, वहीं देना। आप बताइये, कैसा रहा?
        एक दिन उन्होंने मुझसे शिकायत की- ‘रात के समय ऊपर से तुम्हारे चलने की धम-धम आवाज आती है, उससे मेरी नींद खुल जाती है।’
‘रात में बाथरूम जाना पड़ता है, कैसे रोका जाए, आप बताओ?’
‘रोकने को नहीं बोल रहा हूँ सेठ, आहिस्ता चला करो।’ उन्होंने मुझे समझाया।
        अगली रात मैं बाथरूम जाने के लिए बिस्तर से उठा, अपना एक पैर मैंने जोर से फ़र्श पर रखा, तब ही अचानक मुझे मकानमालिक की सीख याद आ गई। मैंने अपना दूसरा पैर आहिस्ता से जमीन पर रखा और दबे पाँव बाथरूम गया और वापस आ गया। अगली सुबह वे मिले और बोले- ‘यार सेठ, कल रात तुमने फ़िर मुझे सोने नहीं दिया।’
‘क्या हुआ खनगन जी?’
‘कल रात तुम्हारे एक पैर रखने की आवाज ‘धम’ से आई, मेरी नींद खुल गई लेकिन उसके बाद तुम्हारे चलने की कोई आहट नहीं आई, मैं रात भर यह सोचता रहा कि उसके बाद तुमने क्या किया ?’
'अपना एक पैर जैसे ही मैंने फर्श पर रखा, मुझे आपकी बात याद आ गई इसलिए डर के मारे वापस खींच लिया और बिस्तर में ही..........।' मैंने बताया। 

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          इस बीच छोटे भाई राजकुमार का विवाह हुआ। दद्दाजी और मेरे मध्य बोलचाल नहीं थी फ़िर भी पूरे एक माह तक अपनी दूकान छोड़ उनके साथ लगकर शादी का काम किया। माधुरी ने रसोई और मेहमाननवाज़ी सम्हाली और मैंने बाहर का काम। वैवाहिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में रिश्तेदार आए, दद्दाजी के अंतिम पुत्र का विवाह जो था। मेरी छोटी बहन आशा के श्वसुर शिवदयाल जी भी जबलपुर से आए थे। एक फ़ुर्सत में उन्होंने मुझसे पूछा- ‘द्वारका बाबू, सुना, आप अलग रहते हैं?’
‘जी, आपने ठीक सुना।’

‘हमारे कुछ समझ में नहीं आया।’
‘क्या?’
‘पिछले चार दिन से हम आपको और बहूरानी को शादी-ब्याह के काम में जिस प्रकार जुटे देख रहे हैं, मुझे तो अचरज हो रहा है।’
‘इसमें अचरज कैसा साह जी? हमने यह घर छोड़ा है, अपना परिवार नहीं।’ मैंने उन्हें समझाया। उनका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा।
          उधर शादी-ब्याह का काम निपटा और मैं और दद्दाजी फ़िर दूर-दूर हो गए। एक माह का अनवरत साथ भी कोई सकारात्मक परिणाम न ला पाया।
          किराये के घरों में कब तक रहते इसलिए जमीन की तलाश शुरू की। इधर-उधर भटकने के बाद लिंक रोड पर एक धान के खेत पर विकसित ‘कालोनी’ पसन्द आई, दूकान की अर्जित पूंजी से प्लाट खरीद कर इस उम्मीद पर छोड़ दिया कि जब सुविधा होगी तब घर बनवाएंगे।     
          दिन अच्छे गुजर रहे थे, मेरा नया काम अच्छा चल रहा था। हलवाई के धन्धे से मुक्ति मिली, साथ ही संयुक्त परिवार से भी, इस प्रकार मैं मुक्ति का दोहरा आनन्द उठा रहा था। ये मुक्ति शान्तिदायक तो थी लेकिन चुनौतीपूर्ण भी। मैं आत्मविश्वास से भरपूर था, कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी इसलिए भिड़ कर व्यापार किया। तीनों बच्चे बड़े हो रहे थे, घर-परिवार में तनावरहित माहौल, सच में, मज़े की ज़िन्दगी बीत रही थी जिसके लिए हम न जाने कब से तरस रहे थे!
          हमारे शहर के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक रमी के शौकीन थे। लगभग रोज ही उनके घर में बैठक हुआ करती थी लेकिन उस समूह में सीमित लोगों को प्रवेश प्राप्त था, उनमें से एक मेरे मकानमालिक खनगन जी भी थे। खनगन जी ने एक दिन मुझसे कहा- ‘आज रात डाक्टर साहब के घर रमी खेलने चलो।’   
‘नहीं, मैं कभी उनके घर नहीं गया, फ़िर, बिना बुलाए वहाँ जाना ठीक नहीं।’ 
‘डाक्टर साहब ने तुम्हें बुलाया है।’
‘तो फ़िर ठीक है, रात को दस बजे आ जाऊंगा।’ मैंने हामी भरी। निश्चित समय पर मैं पहुंचा, साथ में बैठा, खेला और जैसे ही बारह बजे, मैं उठ खड़ा हुआ और मैंने खनगन जी से पूछा- ‘घर चलोगे?’ उन्होंने बाद में आने की बात कही इसलिए मैं अकेले घर वापस आ गया। 
          हमारी मकानमालकिन सरल स्वभाव की गृहस्थन थी, उनको कभी नाराज होते नहीं देखा-सुना था। अगली सुबह वे ऊपर आई, मैंने दरवाजा खोला, उन्हें नमस्ते की लेकिन वे गुस्से में तमक कर बोली- ‘रात को जब आप घर वापस आते हैं तो आपको नीचे गेट बन्द करना चाहिये, आप कल खुला छोड़ दिए, गाय ने घुसकर मेरे सारे पौधे चर लिए।’ मैंने अपनी छत से बाहर झांक कर देखा, सच में उस बेअक्ल गाय ने गुलाब के सारे पौधे चट कर डाले थे। श्रीमती खनगन ने वे पौधे अत्यन्त परिश्रम से तैयार किए थे, उनमें अनेक रंगों के खूबसूरत गुलाब हुआ करते थे। उनका नाराज होना स्वाभाविक था, उन्होंने मेरी अच्छी ‘परेड’ ली। मैं चुपचाप सुनता रहा और उनकी पीड़ा को समझता रहा पर उनसे क्या बताता कि गेट बंद न करना मेरी नहीं वरन उनके पतिदेव की गलती थी क्योंकि वे मेरे बाद घर आए थे! मैं तो डाँट खा ही चुका था, असलियत जानने के बाद पतिदेव को भी प्रसाद प्राप्त होता इसलिए मैं चुप्पी मार गया। मैंने दो धर्म एक साथ निभाए- किराएदार का और मित्रता का। उस चुप्पी का दूरगामी परिणाम भविष्य में घातक सिद्ध हुआ, दरअसल उसी दिन मेरे उस घर से विदाई की भूमिका तैयार हो गई। आगे का किस्सा आप समझ गए होंगे।    
          एक दिन मकानमालिक ने मुझसे कहा- ‘यार सेठ, मकान खाली कर दो, हम लोग ऊपर ‘शिफ़्ट’ होंगे।’
‘तो हम लोग नीचे शिफ़्ट हो जाते हैं।’
‘नहीं, नीचे कुछ बनवाना है।’
‘मैंने जब आपसे मकान किराए पर लिया था तब आपसे कहा था कि जब तक मेरा खुद का मकान नहीं बन जाता आप मुझसे खाली नहीं करवाएंगे और आपने उस बात को माना था। मैंने जमीन ले ली है लेकिन अभी मकान बनवाने की गुन्जाइश नहीं है, दो-तीन साल और लग जाएगा।’
‘नहीं, खाली कर दो।’
‘ठीक।’ मैंने जवाब दिया।
          एक और घर खोज लिया। घर का सामान ट्रेक्टर पर लदते देख मकानमालिक ने पूछा- ‘क्या सेठ, इतनी जल्दी जा रहे हो? मैं सोच रहा था कि अभी खाली करने को कहूंगा तो साल-दो साल लगा दोगे, तुम तो बीस दिन में खाली कर गए।’
‘मैं आपसे लड़-झगड़ कर नहीं, मित्रवत जाना चाहता हूं।’ मैंने उन्हें बताया। मकानमालिक दुखी भाव से अपने घर के अन्दर चले गए।

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          किराए का नया घर ग्राउन्डफ़्लोर था लेकिन किराया दोगुना था। हमारे तीनों बच्चे हिन्दी माध्यम वाले सरस्वती शिशु मन्दिर में पढ़ते थे, पढाई का स्तर अच्छा था। मेरे एक मित्र ने मुझसे प्रश्न किया- ‘यार, तुम अपने बच्चों के दुश्मन हो क्या?’
‘कैसे?’
‘तुम बच्चों को हिन्दी मीडियम में पढ़ा रहे हो, आज जमाना अंग्रेजी का है, ऐसे में वे तरक्की कैसे करेंगे?’

‘तुम ठीक कह रहे हो परन्तु मेरे घर में बोलचाल की भाषा हिन्दी है इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि वे किसी भी विषय को अपनी मातृभाषा में आसानी से समझ सकेंगे।’
‘पर जमाना तो अंग्रेजी का है, वे प्रतिस्पर्धा में कैसे टिकेंगे?’
‘तो अंग्रेजी सीखने में क्या परेशानी है? यह आसान है, सीख लेंगे।’
‘अंग्रेजी के माहौल की अंग्रेजी अलग होती है, द्वारिका!’
‘होती होगी यार, मुझे अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी मीडियम उन पर मानसिक अत्याचार लगता है, खास तौर से जबकि वे हिन्दी के माहौल में पल-बढ़ रहे हैं।’
‘तुम मेरी बात नहीं मानोगे?’
‘नहीं, अपने देश में, अपनी भाषा के साथ हो रहा अतिक्रमण मुझे दुख देता है।’
‘तो तुम ज़माने के साथ नहीं चलोगे?’
‘क्या मैं भेड़ हूँ जो भीड़ के साथ चलूं?’
‘तुम अकेले पड़ जाओगे।’
‘कोई बात नहीं, जो मैं कर सकता हूँ, जरूर करूंगा।’
‘जैसे?’
‘मैं अपने सारे काम हिन्दी भाषा में ही करता हूँ, समस्त पत्रव्यवहार, लिफ़ाफ़ों पर पता, दूकान की बिलबुक, बैंक के सभी कार्य आदि शतप्रतिशत हिन्दी में करता हूँ।’
‘क्या तुम अंग्रेजी से नाराज हो?’
‘नहीं, मैं अंग्रेजी भाषा की कद्र करता हूँ, मैंने यदि अंग्रेजी न सीखी होती तो मैं विश्व के अद्भुत साहित्य से वंचित रह जाता।’
‘फ़िर?’
‘तुम भले चाहे जो समझो पर हिन्दी के साथ हो रहा अन्याय और अंग्रेजी के लिए हो रही अंधी दौड़ मुझे बहुत अज़ीब लगती है।  मेरा संकल्प है कि अपने स्तर पर अपनी मातृभाषा अपनाने के लिए जीवन भर प्रयत्न करूंगा।’

       किराए का नया घर विद्यानगर में लिया जो सरस्वती शिशु मंदिर से दूर था इसलिए बच्चे समीप में ही स्थित सेंट जोसेफ (हिंदी माध्यम) में पढ़्ने लगे। तीनों बच्चे पढ़ाई में सामान्य थे, हर साल पास हो जाते थे, बस। हमारे घर में रंगीन टीवी और व्ही.सी.आर. था जो बच्चों का अधिकांश समय लील जाता था, वैसे भी पढ़ना सबको रुचता नहीं- इसलिए हमने कभी जोर-जबर्दस्ती नहीं की। 
       कुन्तल सात वर्ष का हो चुका था, समझदार हो रहा था इसलिए जुआँ खेलने की हमारी पारिवारिक परम्परा से उसे मुक्त रखने की बात मेरे मन में आई। मैंने ताश खेलना छोड़ दिया। अब, पच्चीस वर्ष हो चुके हैं, मुझे ताश को हाथ लगाए ! ठीक किया न?
       मेरा टीवी का व्यापार ठीक-ठाक चल रहा था, घर खर्च निकल जाता था। पत्नी और बच्चे खर्चीले नहीं थे इसलिए कोई असुविधा भी नहीं थी। टीवी की दूकान ‘मधु छाया केन्द्र’ एक तकनीकी कारण से पार्टनरशिप फ़र्म के रूप में शुरू की गई थी, उसकी इन्कमटेक्स की पेशी के लिए सूचना आई। मेरे आयकर वकील ने मुझे बताया कि आयकर अधिकारी को पांच सौ रुपए देना पड़ेगा तब फ़र्म का रजिस्ट्रेशन होगा अन्यथा साहब कोई न कोई अड़ंगा लगा देगा। मैंने उनसे कहा- ‘मैं किसी को रिश्वत नहीं देता।’
‘आप क्यों लफ़ड़े में पड़ते हो, ले-दे कर नक्की करिए।’
‘नहीं।’
‘अच्छा एक काम करिए, पांच सौ मुझे मेरी फ़ीस समझ कर दे दीजिए। आप कल पेशी में आ जाना, आपको कुछ कहना-सुनना नहीं है, बाकी सब मैं देख लूंगा।’ 
‘ठीक है।’ मैंने उन्हें पांच सौ रुपए दे दिए।
       अगले दिन मैं पेशी में गया। आयकर अधिकारी ने अपनी मुन्डी उठाकर वकील से संकेत में पूछा कि क्या है? वकील ने कहा- ‘पार्टनरशिप रजिस्ट्रेशन का केस है सर।’
‘क्या करना है? साहब ने पूछा।
‘करना है सर।’ वकील ने मुस्कुरा कर कहा। साहब ने इशारों मे पूछा ‘कितना।’ वकील ने अपने दाहिने हाथ के पंजे को दिखाकर ‘पाँच’ का इशारा किया। साहब ने भी अपनी पाँचों उंगलियां दिखाकर ‘कन्फ़र्म’ किया। पेशी खत्म हो गई।
        शाम को वकील मेरे पास चिन्तित से आए और मुझसे कहा- ‘भाई साहब, गड़बड़ हो गया।’
‘क्या हुआ?’
‘साहब पाँच हजार रुपए मांग रहे हैं।’
‘अरे, पांच सौ की बात थी, आपने इशारा भी किया था।’
‘पांच सौ का ही रेट है पर वो पांच हजार पर अड़ गए हैं।’
‘आप समझाओ उनको।’
‘मैंने समझाया पर वे माने नहीं, मैं उनको जोर नहीं दे सकता, मेरा रोज का काम है।’
‘फ़िर?’
‘फ़िर क्या, पांच हजार देना पड़ेगा।’
‘मरवा दिया आपने मुझे। अब, मैं खुद साहब से बात करता हूँ, कहां है उसका घर?’
‘विनोबा नगर में, गायत्री मन्दिर के आगे।’
‘ठीक है, आप जाओ, उसको मैं देखता हूँ।’ मैंने उनको विदा किया। 
          उसी रात लगभग नौ बजे मैं उस साहब के घर पहुंचा। अपने साथ एक बड़े साइज का ‘केलेन्डर’ और एक डिब्बा मीठा भी ले गया। साहब ने पूछा- ‘ये क्या ले आए?’
‘आपके लिए है सर।’
‘कैसे आए?’
‘मधु छाया केन्द्र के रजिस्ट्रेशन का केस है आपके पास। वकील साहब ने मुझे बताया था कि पांच सौ लगेगा परन्तु आपने पांच हजार कहा है।’
‘हाँ, उतना ही होता है।’
‘बात दरअसल ये है सर, कि यह व्यापार मेरे पिताजी के नियंत्रण में है, वे बहुत कड़क इन्सान हैं, किसी को एक रुपए भी नहीं देते, पुराने टाइप के आदमी हैं न!’
‘तो?’
‘आपको देने के लिए मैंने उनकी गैर जानकारी में अपने पास से रुपए दिए थे।’
‘फ़िर?’
‘उतने में ही मान जाइये, सर।’ 
‘नहीं।’
‘चलिए, पांच सौ और दे देता हूं।’ 
‘नहीं।’
‘पांच सौ और बढ़ा देता हूँ परन्तु मेरे पिताजी को न मालूम पड़े सर, नहीं तो मुझे घर से निकाल देंगे।’
‘मैं तुम्हारे पिता को क्यों बताऊंगा?’
‘जी, आपकी कृपा है सर।’ मैं वापस मुड़ा तो उन्होंने कहा- ‘सुनो।’
‘जी सर।’
‘आज तुमने इन्कम टेक्स आफ़िसर को साग-सब्जी बेचने वाला कुंजड़ा बना दिया।’
‘सारी सर।’ मैंने कहा और त्वरित गति से उसके घर के बाहर निकला, स्कूटर स्टार्ट की और कुछ दूर जाकर जोर से ठहाका लगाया। वैसे तो पांच सौ की जगह मेरे पन्द्रह सौ रुपए ठुक गए थे पर मैं फिर भी खुश था, क्यों खुश था?

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          समाज में मिलजुल कर रहने की अवधारणा योग्य-अयोग्य, सक्षम-अक्षम, स्वस्थ-अस्वस्थ, धनिक -निर्धन, सबके परस्पर सहयोग की है। लेकिन जबसे ‘मैं’ और ‘मेरा’ ने हमारी सोच पर कब्ज़ा किया, पूरी सामाजिक व्यवस्था डगमगा गई। रिश्ता कोई भी हो, वह अब क्षणिक हो गया है, सम्पूर्ण व्यवहार ‘धन-आगमन’ पर केन्द्रित हो गया है। फ़िल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ में एक गीत था- ‘यारो, समझो इशारे, फ़ौरन पुकारे, पम पम पम; यहाँ चलती को गाड़ी, कहते हैं यारों, पम पम पम।’ सबकी ज़िंदगी में यही होता है।
          इस बीच दद्दा जी से मेरा जुड़ना-न-जुड़ना लगा रहता था। लॉज का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, दो-चार महीने, मेरा उनसे तालमेल बना रहता फ़िर कोई न कोई ऐसी बात हो जाती कि मैं उनके पास जाना बन्द कर देता लेकिन वे पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी पूरे उत्साह से लॉज के निर्माण कार्य में जुटे रहते।
          मेरा व्यापार खरामा-खरामा चल रहा था लेकिन जमीन खरीद लेने के कारण व्यापार में लगी पूंजी नहीं के बराबर हो गई। पूरा माल उधार में आता और बिकता भी लेकिन जोखिम लेने का साहस कम हो जाने से मेरे व्यापार में विपरीत प्रभाव पड़ने लगा। ब्लेक-व्हाइट टीवी की मांग कम होने लगी और रंगीन टीवी अधिक बिकने लगे। रंगीन टीवी बहुत मंहगे आते थे, लगभग पन्द्रह हजार के, जिसका पर्याप्त स्टाक रखने की व्यवस्था तब हो पाती जब उसके अनुरूप पूंजी हाथ में होती। जिस दूकान में भरपूर स्टाक होता है वहां ग्राहक को प्रभावित करना आसान होता है पर जहां स्टाक कम रहता है वहां ग्राहक को साधना बहुत कठिन होता है। फ़िर, उन दिनों बाज़ार में विभिन्न राज्यों में निर्मित टीवी का ‘क्रेज’ टूटने लगा था और उनके बदले ‘बी.पी.एल.’, ‘ओनिडा’, ‘फिलिप्स’, ‘वीडियोकोन’, ‘बिनाटोन’, ‘क्राउन’ जैसी कम्पनियों के रंगीन टेलीविजन बाजार में लोकप्रिय हो गए थे। इनकी डीलरशिप के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत थी जो मेरे पास नहीं थी। बैंक लिमिट बढ़ाने को तैयार न था जबकि बैंक से ली गई रकम जमीन खरीदी में फ़ंस चुकी थी जिसका ब्याज हर महीने पच्चीस हजार मेरे ऊपर चढ़ जाता था। एक शाम बड़े भैया रायपुर से आए, मेरी दूकान की दशा देखकर मुझसे बोले- ‘क्या बात है, तुम्हारा स्टाक बहुत कम है?’

‘ठीक ही है।’ मैंने उत्तर दिया।
‘क्या ठीक है? ये लो, ये रख लो, अपना स्टाक ठीक करो, जब तुम्हारे पास व्यवस्था हो जाए तब वापस कर देना।’ उन्होंने अस्सी हजार मुझे दिए। उस ‘आक्सीजन’ को प्राप्त करने की खुशी को मैं शब्दों में कैसे व्यक्त करूं? पर वह प्राणवायु भी कितना साथ देती जहां व्यापार पर तगड़ा ब्याज हावी हो और उसके अनुपात में लाभ कम हो रहा हो!
  
        ३ नवम्बर १९९८ की सुबह लगभग छः बजे मेरे घर की कालबेल बजी, मैंने जागकर दरवाजा खोला तो आश्चर्यचकित रह गया। अम्मा और दद्दाजी आए थे, मेरे घर से अलग होने के बाद वे पहली बार हमारे घर आए थे, दुखी दिख रहे थे। दोनों अन्दर आकर बैठे और मुझे धीमी आवाज में माधुरी की माँ के निधन का दुःखद समाचार बताया- ‘अभी जबलपुर से फोन आया था।’ मैने जाकर माधुरी को बताया तो वे वहीं जमीन पर निश्चेष्ट होकर बैठ गई और रोने लगी। अम्मा उनको ढाढ़स बंधाने लगी और दद्दाजी ने मुझसे कहा- ‘तुम बहू को लेकर जल्दी ट्रेन से रायपुर के लिए निकलो, वहां से साढ़े दस बजे जबलपुर के लिए हवाईजहाज निकलेगा, अन्त्येष्टि दोपहर को होगी, तब तक तुम लोग पहुँच जाओगे। रायपुर में बड़े भैया सब व्यवस्था बना रहे हैं।’
        रायपुर से जबलपुर तक की हवाईयात्रा मुश्किल से आधे घंटे की थी, माधुरी गुमसुम बैठी रही और मैं अपनी सासूमाँ के स्नेहसिक्त स्वभाव को याद करता रहा। मैं जब भी ससुराल जाता तो रसोई में उनके पास अपनी थाली लेकर बैठ जाता, वे गरम-गरम रोटी सेंककर मुझे देती, मुस्कुराती जाती और कहती- ‘लालाजी, उतै डायनिंग टेबल में बैठवे के बदले आप इतै जमीन में बैठ के खात हो, जे हमें अच्छो नइ लगत।’
‘पर मुझे तो आपके पास बैठकर खाने में ही मजा आता है।’ जब मैं ऐसा कहता तो वे आँचल से अपनी आँखों के कोर पोछने लगती। 
        मैं जब भी उनसे मिलता था तो लौटते समय वे अपने मोटे कांच वाले चष्मे से मुस्कुराते हुए मुझे निहारती और बीस रुपए मुझे अवश्य देती थी। एक बार की बात है, मैं ससुराल गया था, रात की ट्रेन थी, हम सब गप-शप करते बैठे थे। जैसे ही समय हो गया मैंने कहा- ‘अब मैं चलता हूँ।’ सासूमाँ ने मुझे विदाई देने के लिए रुपए निकाले तो सौ का एक नोट निकला। सौ का नोट देखकर मेरा मन मुदित हो गया लेकिन वह प्रसन्न्ता क्षणभंगुर थी। उन्होंने अपने मँझले पुत्र से पूछा- ‘काए मदन, तुम्हाए पास बीस रुपय्या चिल्लर हैं?’ मदन के पास भी चिल्हर नहीं था। मैंने सासूजी से कहा- ‘कोई बात नहीं, आप पूरे सौ रुपए दे दीजिए।’ पर उनके हाथ से सौ का नोट छूटा नहीं। फ़िर मैंने उनको समझाया- ‘इसके पहले मैं जब आया था तो दो बार आपने विदाई नहीं दी थी, उसके चालिस रुपए, इस बार का बीस रुपए, कुल साठ रुपए, बचे चालिस, तो अगले दो बार आप मत देना।’
‘आप तो, लाला जी...’ कहते हुए, हंसी से बेहाल होते हुए सौ का नोट आखिर मुझे दे दिया।
        दोपहर को हम लोग घर पहुँचे, पचपन वर्षीया सासूमाँ की पार्थिव देह सफ़ेद चादर में लिपटी रखी थी। उनका सदा मुस्कुराता चेहरा एकदम शान्त था और जैसे मुझसे कह रहा था- ‘लाला जी, तन्नक जल्दी आने रहो, आपने तो देर कर दई।’

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          राष्ट्रीय प्रशिक्षक बनने के बाद मुझे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षक बनने की धुन सवार हो गई लेकिन उस स्पर्धा में प्रविष्ट होने के लिए ढेर सारे रुपयों की ज़रूरत थी क्योंकि उसमें भाग लेने के लिए उन अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशनों में जाना पड़ता जहां इसकी स्पर्धा आयोजित होती थी। ‘इन्टरनेशनल ग्रेजुएट’ बनने के लिए तीन सीढ़ियां थी, पहले ‘प्राइम’, फ़िर ‘एक्सेल’ और अन्त में ‘ओम्नी’ यानी तीन विदेश यात्राएं ! अपनी आर्थिक स्थिति वैसे ही डावांडोल थी, किसी प्रकार परिवार चला रहा था, विदेश कैसे जाता? अपने साथियों को 'क्वालीफ़ाई' करते देखता और लक्ष्मीजी की आरती का स्मरण कर चुप रह जाता- ‘...सब सम्भव हो जाता, जी नहीं घबराता, जय लक्ष्मी माता।’ उनकी पूजा तो हम लोग प्रत्येक दीपावली में विधि-विधान से करते थे लेकिन न जाने क्यों, उनकी कृपादृष्टि बिलकुल भी नहीं हो रही थी। उधर, सिद्धि विनायक की भी साथ में पूजा-अर्चना हो रही थी पर वे प्रभु भी मुझसे अपना श्रीमुख मोड़े हुए थे।
          प्रशिक्षक बनने के बाद मुझे उत्तर भारत के अनेक स्थानों में जाने और प्रशिक्षण देने के अवसर मिले। ‘लीडरशिप इन एक्शन’, ‘स्पीच क्राफ़्ट’ और ‘ज़ोन ट्रेन द ट्रेनर्स वर्कशाप’ के कार्यक्रमों में पायलट फ़ेकल्टी के रूप में हरियाणा के करनाल, बिहार के झूमरी तलैया और रांची, उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी, महाराष्ट्र के नागपुर और अमरावती, मध्यप्रदेश के ग्वालियर, भोपाल, इन्दौर, रायपुर, रायगढ़, दुर्ग आदि शहरों में प्रशिक्षण देने और सीखने का मौका मिला।
          लखीमपुर खीरी में ‘स्पीचक्राफ़्ट’ की एक घटना मुझसे भुलाए नहीं भूलती। हुआ ये, कि २६ प्रशिक्षुओं को प्रभावी ढंग से बोलने की कला सिखानी थी। प्रथम दिवस दस घंटे तक चले सत्र में सबसे पहले प्रत्येक प्रतिभागी को उसके मनपसन्द विषय पर बोलने के लिए तीन-तीन मिनट का समय दिया गया ताकि प्रतिभागी के वर्तमान प्रस्तुतीकरण के स्तर का आकलन किया जा सके। उसके बाद उन्हें बोलने की तकनीक, विषय वस्तु की तैयारी आदि के बारे में उदाहरण सहित विस्तार से विधियां बताई गई। सत्र के अन्त में सबको एक चिट उठाकर अगले दिन प्रस्तुतीकरण के लिए विषय दिए गए जो उनके लिए ‘होमवर्क’ जैसा था। विषय गम्भीर, उपयोगी और रोचक चुने गए थे जैसे- ‘जेसीज को कैसे बढ़ाया जाए’, ‘युवा शक्ति का विदोहन’, ‘यदि मुझे प्रधान मन्त्री बना दिया जाए’, ‘क्या अपने विवाह में मैं दहेज का विरोध करूंगा’, ‘बढ़ता भ्रष्टाचार’, ‘मेरी मनपसन्द हीरोइन’, ‘फ़िल्म और समाज’ आदि। कुल २६ विषय लिखकर पर्चियों को मिक्स कर दिया गया और जिसने जो पर्ची उठाई, उसी विषय पर अगले दिन उसे पाँच मिनट का भाषण प्रस्तुत करना था। उन पर्चियों में एक विषय था- ‘मैं कमीना हूं।’ जिसने उस विषय की पर्ची उठाई, वह उसे पढ़कर मुस्कुराया और चला गया।


          अगली सुबह सत्र आरम्भ होने के पहले अध्याय अध्यक्ष ने मुझसे कहा- ‘सर, आपने हमारे सदस्य को गाली दी?’
‘नहीं तो ?’ मैंने पूछा।
‘आपने उसे कमीना बना दिया।’ अध्यक्ष ने रोष में कहा।
‘नहीं, एक विषय दिया गया ताकि वह अपना प्रस्तुतीकरण कर सके।’
‘कोई और विषय नहीं मिला, आपने उसका अपमान किया है।’
‘कमाल है, आप कह रहे हैं कि अपमान हुआ है, वे तो अपने विषय को पढ़कर प्रसन्न दिख रहे थे।’
‘उसको बाद में वह बात समझ में आई, वो बेहद दुखी है।’
‘उसे बुलाओ, मेरी बात कराओ।’ मैंने कहा। प्रतिभागी से मैंने बात की, उसके आहत मन पर मरहम लगाया और उसे छूट दी कि वह अपने मनचाहे विषय पर प्रस्तुतीकरण दे सकता है। खैर, बात तो बन गई, वर्कशाप बढ़िया रहा, वहां से मुझे पीलीभीत के लिए निकलना था।
         वापसी की ट्रेन रात नौ बजे की थी लेकिन मुझे विदा करने कोई नहीं आया तब मुझे वह समझ में आया जो विषय देते समय मैं न समझ पाया था जबकि मैं उस विषय पर एक रोचक प्रस्तुति की उम्मीद कर रहा था। 
          एक और घटना झूमरी तलैया की याद आ रही है। वहाँ मुझे ‘लीडरशिप इन एक्शन’ पर दो दिवसीय वर्कशाप करने के लिए भेजा गया था। मेरे साथ एक और राष्ट्रीय प्रशिक्षक भी थे, बनारस से आए थे, जो हाल में ही राष्ट्रीय प्रशिक्षक बने थे।  कार्यक्रम का पहला सत्र मैंने लिया, उसके बाद दूसरे सत्र में ‘अभिप्रेरणा’ विषय पर प्रशिक्षण देने का काम उनको सौंप दिया। उन्होंने एक डायरी निकाली और एक के बाद एक ‘मोटीवेशनल’ शेर सुनाने लगे। शायरी सबको पसन्द आई, वाह-वाही से उनका हौसला बढ़ता गया और वे विषय प्रवेश न कर मुशायरे में प्रवेश कर गए। जब मुझे असहनीय हो गया तो मैं उठकर बाहर चला गया, एक घंटे बाद जब मैं लौटा तो उनका ‘सत्र’ सम्पन्न हो चुका था। मैंने अल्प-विश्रामकाल में प्रतिभागियों से पूछा- ‘अभिप्रेरणा का सत्र कैसा रहा?’
‘वाह-वाह।’ जवाब आया। मैंने अपना सिर पीट लिया।
          एक घटना ग्वालियर की, विषय ‘लीडरशिप’ ही था, इन्डियन जूनियर चेम्बर ने मेरे अतिरिक्त एक और प्रशिक्षक भेजा था जो आगरा के एक शासकीय महाविद्यालय में हिंदी की प्रोफ़ेसर थी। शुरुआती दो सत्र उन्हें लेने थे, लंच के बाद के दो मुझे। मेरी ट्रेन लगभग ग्यारह बजे ग्वालियर पहुँची, सज-संवर कर मैं लंच के समय सभागृह पहुँच गया। भोजन करते समय मैंने अपनी सहयोगी प्रशिक्षक से पूछा- ‘पिछले सत्र में आपने क्या ‘कव्हर’ किया?’
‘मैंने तो विषयसूची में निर्धारित चारों विषय दो सत्र में ही निपटा दिया।’ उन्होंने मासूमियत से बताया।
‘मेरे लिए क्या बचा?’
‘अब आपके लिए तो कुछ बचा नहीं, मैं तो समझी कि आप नहीं आओगे।’
‘पर मेडम, मेरा देर से आना तो पूर्वसूचित था, आपको कार्यक्रम संयोजक ने नहीं बताया? चलिए, कोई बात नहीं, उस विषय पर कुछ और बातें बता देता हूं।’ मैंने उन्हें समझाया। उन्होंने मुझे ज़रा अचरज़ से देखा।
          लंच के बाद वाला सत्र तीन घंटे चला, ‘लीडरशिप’ व्यापक विषय है, 'हरि अनंत हरि कथा अनंता', चाहे  जितना भी बता दो, कम है। मेरी उस प्रस्तुति के दौरान, पूरे समय मेरी सहयोगी प्रशिक्षक गौर से मुझे देखती-सुनती रही। समापन सत्र में हम दोनों अगल-बगल बैठे। उन्होंने मुझसे तनिक झुककर प्यार से पूछा- ‘आप कहीं पढ़ाते हैं क्या ?’
‘नहीं तो।’
‘फ़िर, क्या करते हैं?’
‘हलवाई हूं।’
‘ओ, नो।’ वे चमक कर बोली।
‘ओ, येस।’ मैंने  मुस्कुराकर कहा।

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